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मसौदा एसआईआर मतदाता सूची में नाम नहीं होना, नाम हटना नहीं है: निर्वाचन आयोग ने अदालत में कहा

पणजी, 13 अक्टूबर (भाषा) निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को मुंबई उच्च न्यायलय में कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद मसौदा मतदाता सूची में किसी मतदाता का नाम न होने का मतलब यह नहीं है कि उसे हटा दिया गया है।

आयोग के यह कहने के बाद उच्च न्यायालय ने गोवा के एक बाशिंदे की रिट याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील आशुतोष कुंभकोणी ने उच्च न्यायालय की गोवा पीठ को बताया कि विशेष गहन पुनरीक्षण का मतलब नये सिरे से मतदाता सूची तैयार करना है, जबकि विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसएसआर) में सूची को सिर्फ़ अद्यतन किया जाता है।

बहस पूरी होने के बाद न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया। यह सुनवाई एसआईआर और निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर चल रहे जबरदस्त विवाद के बीच हुई।

उत्तरी गोवा ज़िले के सेंट क्रूज निर्वाचन क्षेत्र में रहने वाले परेश सालगांवकर के परिवार के छह सदस्यों ने एक रिट याचिका दायर की थी। उनका दावा था कि एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए गए थे।

आयोग के वकील ने बताया कि एसआईआर व्यापक और ‘नए सिरे से’ की जाने वाली एक प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें मतदाता सूची को ‘बिल्कुल शुरू से नए सिरे से तैयार’ करना होता है, जबकि विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण में पहले से मौजूद सूची को अद्यतन किया जाता है।

वकील कुंभकोनी ने कहा, ‘‘मसौदा एसआईआर सूची में नाम न होने का मतलब अपने-आप नाम हटा दिया जाना नहीं है।’’

उन्होंने कहा कि चूंकि मतदाता सूची नए सिरे से तैयार की जा रही है, इसलिए मसौदा सूची में नाम न होने का मतलब तकनीकी रूप से नाम ‘हटाया जाना’ नहीं है।

कुंभकोणी ने कहा, ‘‘संक्षिप्त पुनरीक्षण तय प्रक्रिया से मिली जानकारी के आधार पर मौजूदा मतदाता सूची को अद्यतन करता है, जबकि एसआईआर गिनती की प्रक्रिया के आधार पर एक गहन प्रक्रिया के ज़रिए मतदाता सूची को फिर से तैयार करता है।’’

आयोग के वकील ने कहा, ‘‘जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता आठ से दस साल से उस पते पर नहीं रह रहा था, जो एसआईआर से पहले की मतदाता सूची में दिखाया गया था।’’

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने अपना पता बदलने के लिए आवेदन भी नहीं दिया था, जो एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से पहले किया जाना चाहिए था।

कुंभकोणी ने कहा, ‘‘असल में यह एक बेहतरीन उदाहरण है जो एसआईआर की प्रभावशीलता को दिखाता है।’’

खंडपीठ ने कहा कि उसने शुरू से ही यह साफ़ कर दिया था कि एसआईआर प्रक्रिया को ही चुनौती नहीं दी जा सकती है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विवेक रोड्रिग्स ने उच्च न्यायालय से कहा कि गणना चार नवंबर, 2025 को शुरू हुई थी, जिसके बाद ‘बूथ लेवल अधिकारी’ (बीएलओ) ने आठ नवंबर, 2025 को याचिकाकर्ता के पुराने और नए, दोनों पतों का दौरा किया।

रोड्रिग्स ने कहा कि 12 नवंबर को याचिकाकर्ता ने बीएलओ से संपर्क किया और गणना प्रपत्र देने का अनुरोध किया, लेकिन बीएलओ ने देने से मना कर दिया, क्योंकि ‘उसे (प्रपत्र को) मतदाता सूची में दर्ज पते (जो कि पुराना पता था) पर ही पहुंचाया जाना था।’’

याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि बाद में उनके मुवक्किल ने पता बदलने के लिए फ़ॉर्म आठ भरा। निर्वाचन आयोग ने आठ दिसंबर, 2025 को जानकारी दी कि पता बदलने का आवेदन मिल गया है, लेकिन जब 16 दिसंबर को मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित हुई, तो उसमें याचिकाकर्ता का नाम नहीं था।

बीएलओ ने याचिकाकर्ता को बताया कि फ़ॉर्म आठ पर अब भी काम चल रहा था और उसे अस्वीकार नहीं किया गया है।

इसके बाद, 17 जनवरी 2026 को याचिकाकर्ता को निर्वाचन आयोग से एक पत्र मिला कि उसका आवेदन चुनाव पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को भेज दिया गया है। मसौदा मतदाता सूची पर आपत्तियां दर्ज करने की आखिरी तारीख 19 जनवरी थी।

रोड्रिग्स ने कहा, ‘‘इक्कीस जनवरी को मेरा आवेदन खारिज कर दिया गया। अब मेरी स्थिति ऐसी है कि मुझे कहीं सहारा नहीं मिला है और मैं बीच मझधार में फंसा हुआ हूं।’’

भाषा राजकुमार सुरेश

सुरेश