नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय 2023 के एक कानून के उस प्रावधान की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने के लिए मंगलवार को सहमत हो गया, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किये गए कुछ कार्यों के लिए छूट प्रदान करता है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर गैर सरकारी संगठन 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' की याचिका पर उनका जवाब मांगा है।
याचिका में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 को असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध किया गया है।
अधिनियम की धारा 16 में कहा गया है कि वर्तमान में लागू किसी भी अन्य कानून में शामिल किसी प्रावधान के बावजूद, कोई भी अदालत किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कोई दीवानी या फौजदारी कार्यवाही शुरू नहीं करेगी या जारी नहीं रखेगी जो सीईसी या निर्वाचन आयुक्त हैं या रह चुके हैं। यह किसी ऐसे कार्य या शब्द के लिए लागू होगा जो उन्होंने अपने सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के समय या ऐसा करने को प्रदर्शित करते हुए किया या कहा हो।
पीठ ने इस याचिका को इसी तरह के मुद्दे वाली एक अन्य लंबित याचिका के साथ संलग्न कर दिया।
इस साल जनवरी में, उच्चतम न्यायालय 2023 के कानून की धारा 16 के तहत सीईसी और निर्वाचन आयुक्तों को मिली छूट को चुनौती देने वाली एक अलग याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया था।
न्यायालय ने गैर सरकारी संगठन 'लोक प्रहरी' की याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा था। उस समय न्यायालय ने इस प्रावधान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
याचिका में दावा किया गया कि यह प्रावधान सीईसी और निर्वाचन आयुक्तों को उनके पद के घोर दुरुपयोग और कदाचार के लिए किसी भी दीवानी या फौजदारी कार्यवाही से जीवन भर के लिए पूरी और स्थायी छूट देकर उन्हें अभूतपूर्व और असीम शक्तियां देता है।
भाषा सुभाष नरेश
नरेश