श्रीनगर, 13 अक्टूबर (भाषा) जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष दरख्शां अंद्राबी ने मंगलवार को कहा कि इस्लामिक विद्वानों ने तय किया है कि जम्मू-कश्मीर में जुमे की नमाज के दौरान धर्मगुरु किसी एक आम सामाजिक मुद्दे पर बात करेंगे, ताकि जागरूकता फैलाई जा सके।
अंद्राबी के इस बयान पर राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने आरोप लगाया कि यह मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखल देने की भाजपा की कोशिश है।
जम्मू-कश्मीर के कई सामाजिक-धार्मिक संगठनों के समूह मुताहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने आरोप लगाया, 'यह धार्मिक क्षेत्र में राज्य की जबरन घुसपैठ है, जो कानून और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ है'।
मीरवाइज उमर फारूक इस समूह के प्रमुख हैं।
शनिवार को जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड से जुड़े इस्लामिक विद्वानों और उपदेशकों की एक बैठक हुई, जिसमें जुमे के बयान में सामाजिक मुद्दों पर बात करने का फ़ैसला लिया गया।
अंद्राबी ने कहा कि इस्लामिक विद्वानों (उलेमा) और धार्मिक गुरुओं का यह फ़र्ज़ है कि वे रस्मी प्रार्थनाओं से आगे बढ़कर लोगों को सही रास्ता दिखाएं।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह एक सामूहिक फ़ैसला था और इसके पीछे कोई छिपा हुआ एजेंडा या 'सरकारी आदेश' नहीं था।
अंद्राबी ने पीटीआई-भाषा को बताया, 'जुमे को उपदेश (खुतबा) दिया जाता है है; पैगंबर साहब की शिक्षाएं बताई जाती हैं। हमारा धर्म हमें समुदाय, भाईचारे और इंसानियत के बारे में क्या सिखाता है और समाज में कोई बुराई नहीं होनी चाहिए - ये बातें हम बचपन से ही सुनते आ रहे हैं। इस्लामिक विद्वानों ने सामूहिक रूप से यह फैसला किया कि सामाजिक मुद्दों पर काम करना एक साझा मकसद है।'
उन्होंने कहा कि जो नेता इस फ़ैसले की आलोचना कर रहे हैं, उन्हें पहले तथ्यों को समझना चाहिए।
उन्होंने कहा, 'यह फ़ैसला दरख्शां अंद्राबी या अधिकारी नहीं करते, बल्कि वे धार्मिक नेता करते हैं जो लोगों को सही मायने में धर्म के रास्ते पर ले जाते हैं।' उन्होंने कहा, 'नेताओं को तथ्यों को जाने बिना ही तुरंत ट्वीट करने का कोई अधिकार नहीं है।'
हालांकि, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि 'भाजपा द्वारा नियुक्त' वक्फ़ बोर्ड की अध्यक्ष को 'अपने आकाओं को खुश करने की गलत कोशिश' तुरंत रोक देनी चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि यह कदम 'हमारे धर्म और आस्था में एक और दखल' है।
उन्होंने यहां पत्रकारों से कहा, 'दुर्भाग्य से, मुसलमानों को परेशान करना और उनके धर्म में दखल देना भाजपा का एजेंडा है। सामान नागरिक संहिता (यूसीसी) की तरह ही, वे यहां भी एकरूपता लाना चाहते हैं।'
उन्होंने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर को भाजपा के लिए एक 'प्रयोगशाला' बना दिया गया है।
उन्होंने कहा, 'सबसे पहले इसका प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता है और फिर पूरे देश में लागू किया जाता है। जम्मू-कश्मीर मुस्लिम-बहुसंख्यक राज्य है। वे कौन होते हैं यह तय करने वाले कि हमारे मौलवी और इमाम शुक्रवार को क्या उपदेश देंगे?
मुफ्ती ने सवाल किया, 'यह कौन तय करेगा? क्या हमारे अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री, जो गैर-मुस्लिम हैं, वह तय करेंगे? यह फैसला कौन करेगा?'
पीडीपी प्रमुख ने कहा, 'हम यह कैसे मान सकते हैं कि दिल्ली में बैठा कोई गैर-मुस्लिम मंत्री या भाजपा के नियंत्रण वाला वक्फ़ बोर्ड जिससे यहां के मुसलमानों का कोई लेना-देना नहीं है....यह तय करे? यह मंजूर नहीं है। बिल्कुल मंजूर नहीं है।'
महबूबा मुफ्ती ने वक्फ बोर्ड को जम्मू-कश्मीर सरकार को सौंपने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि शुक्रवार के उपदेशों को लेकर कोई फैसला करना है, तो मौलवी उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा को यह फैसला करना चाहिए, क्योंकि उसे ऐसा करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि उमर फारूक जम्मू-कश्मीर के मीरवाइज हैं।
इस बीच, मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू) ने एक बयान में कहा कि किसी वैधानिक संस्था द्वारा मस्जिदों के मिंबर (उपदेश देने का स्थान) से दिए जाने वाले उपदेशों को तय या नियंत्रित करने का सुझाव भी ‘‘हास्यास्पद’’ है और जम्मू-कश्मीर के मुसलमान इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।
भाषा राखी अविनाश
अविनाश