नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर (भाषा) विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पर विचार-विमर्श करने वाली संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के प्रमुख भाजपा सांसद संजय जायसवाल ने मंगलवार को कहा कि प्रस्तावित अधिनियम के मुख्य प्रावधान वही हैं जो संप्रग सरकार द्वारा 2010 में लागू किये गए कानून में शामिल किये गए थे।
जायसवाल ने यह बात उस समिति की बैठक के बाद कही, जिसने हिंदू, ईसाई और अन्य समूहों से बातचीत की और प्रस्तावित कानून पर उनकी राय सुनी। प्रस्तावित कानून को कुछ वर्गों और विपक्षी दलों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
भाजपा सांसद ने कहा कि 2010 के अधिनियम ने गृह सचिव और प्रधान सचिव को विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (एफसीआरए) के तहत विदेशी वित्त पोषण प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठन की संपत्तियों को अनियमितताओं की स्थिति में जब्त करने का अधिकार दिया था, जबकि नये विधेयक में यही अधिकार एक निर्दिष्ट प्राधिकार को देने का प्रस्ताव किया गया है।
उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘‘संप्रग सरकार जो कानून लाई थी, उसमें यह तय किया गया था कि अगर एफसीआरए के तहत कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो सारी संपत्ति संबद्ध राज्य के गृह सचिव या प्रधान सचिव को सौंप दी जाएगी। हालांकि, आज उस व्यवस्था की जगह एक निर्दिष्ट प्राधिकार है।’’
जायसवाल ने कहा कि मंगलवार को समिति के समक्ष अपने विचार रखने वालों में सिरो-मालाबार चर्च, रामकृष्ण मठ और इस्कॉन के प्रतिनिधि शामिल थे।
जायसवाल ने कहा, ‘‘सभी ने अपनी राय रखी। हमने सबकी बातें ध्यान से सुनीं। जब हम अपनी समिति की बैठक करेंगे, तो इन मामलों पर चर्चा करेंगे। हमने सबकी बात सुन ली है और इसके बाद, समिति की बैठक में इन सभी बिंदुओं पर विचार-विमर्श करेंगे। हम मिलकर फैसले लेंगे।’’
यह विधेयक 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था और विपक्षी दलों की लगातार मांग के बाद 12 अगस्त को इसे जेपीसी को भेज दिया गया। विपक्ष का यह भी आरोप है कि प्रस्तावित कानून के कुछ प्रावधान बेहद आपत्तिजनक हैं।
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