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आजाद मैदान से फ्रीडम पार्क तक भारत के विभिन्न शहरों में विरोध-प्रदर्शन के मुख्य केंद्र

नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर (भाषा) इतिहास के झरोखे में झांकें या वर्तमान पर नजर डालें, देश के लगभग हर शहर में, चाहे वह कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगर हों या जयपुर और पणजी जैसे छोटे शहर, विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित कोई न कोई जगह जरूर रही है। समय के साथ सार्वजनिक सुविधा के नाम पर इनमें से कई जगहों को भले ही विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों की सूची से हटा दिया गया, लेकिन कुछ जगहें आज भी “अभिव्यक्ति की आजादी के केंद्र” या “प्रतिरोध स्थल” के तौर पर बनी हुई हैं।

इनमें से कुछ जगहें ब्रिटिश हुकूमत के दमन की गवाह रही हैं, जबकि कई स्थलों को महात्मा गांधी और उनके सत्याग्रह से जुड़ाव के कारण खास पहचान मिली। सोमवार को जब दिल्ली पुलिस ने शहर के बीचों-बीच स्थित जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थल के तौर पर दी गई मान्यता खत्म कर दी, तो देशभर के दूसरे “जंतर-मंतर” पर ध्यान केंद्रित हो गया, जिनमें से ज्यादातर सत्ता के केंद्रों के पास ही स्थित हैं।

आजाद मैदान, मुंबई

-यह मूल रूप से ‘एस्प्लेनेड’ नाम के एक विशाल खुले मैदान का हिस्सा था। वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान यहां लोगों को सरेआम फांसी दी जाती थी। बाद में आजादी की लड़ाई के दौरान यह राष्ट्रवादी विरोध-प्रदर्शनों का एक मुख्य केंद्र बन गया। वर्ष 1931 में महात्मा गांधी ने यहां एक विशाल रैली की थी।

आजाद मैदान से कुछ ही किलोमीटर दूर मुंबई का एक और विरोध-प्रदर्शन स्थल ‘अगस्त क्रांति मैदान’ मौजूद है, जहां से गांधी ने 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू किया था। पास में ही शिवाजी पार्क भी है, जो बड़ी राजनीतिक सभाओं और सार्वजनिक रैलियों के लिए एक और प्रमुख जगह है।

फ्रीडम पार्क, बेंगलुरु

-लंदन के हाइड पार्क की तर्ज पर बना फ्रीडम पार्क बेंगलुरु में सार्वजनिक रैलियों और विरोध-प्रदर्शनों के लिए समर्पित स्थल है। शुरू में अंग्रेजों ने वहां एक केंद्रीय कारागार बनाया था, जहां कई स्वतंत्रता सेनानियों को कैद किया गया था और फांसी दी गई थी। आपातकाल के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी समेत कई विपक्षी नेताओं को वहां कैद किया गया था। वर्ष 2008 में केंद्रीय कारागार की जगह ‘फ्रीडम पार्क’ बनाया गया, जिसमें एक जेल संग्रहालय भी है।

ब्रिगेड परेड ग्राउंड, कोलकाता

-प्लासी की लड़ाई में जीत के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं ने इसका परेड ग्राउंड के तौर पर इस्तेमाल शुरू किया। यह मैदान आजादी के आंदोलन के दौरान विरोध-प्रदर्शन का एक मुख्य केंद्र बनकर उभरा, जहां रॉलेट एक्ट के खिलाफ देशबंधु चित्तरंजन दास ने एक बड़ी रैली भी आयोजित की थी।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ब्रिगेड परेड ग्राउंड में तत्कालीन सोवियत संघ के नेताओं के लिए एक सार्वजनिक स्वागत समारोह आयोजित किया था। इसके अलावा, पाकिस्तान के खिलाफ भारत की जीत के बाद बांग्लादेश की स्थापना पर इंदिरा गांधी ने यहां एक कार्यक्रम के लिए मुजीबुर रहमान को आमंत्रित किया था। ब्रिगेड परेड ग्राउंड पश्चिम बंगाल में रैलियों के आयोजन के लिए पसंदीदा स्थल भी रहा है, फिर चाहे वह वामपंथी सरकार का दौर रहा हो या तृणमूल कांग्रेस या भाजपा का शासन।

एस्प्लेनेड के पास स्थित रानी राशमोनी एवेन्यू, शहीद मीनार मैदान और कॉलेज स्क्वायर कोलकाता में विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित अन्य स्थल हैं।

गांधी मैदान, पटना

-पहले ‘पटना लॉन्स’ और ‘बांकीपुर मैदान’ के नाम से जाना जाने वाला यह विशाल मैदान गंगा के किनारे स्थित है और यहां कई ऐतिहासिक विरोध-प्रदर्शन और रैलियां हुई हैं। अंग्रेजों ने इस मैदान को सैन्य अभ्यास, घुड़दौड़, पोलो और गोल्फ के लिए विकसित किया था। बाद में यह स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रैलियों का एक प्रमुख स्थल बन गया, जहां चंपारण आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े प्रदर्शन भी आयोजित किए गए।

मुहम्मद अली जिन्ना ने 1938 में यहां मुस्लिम लीग के एक अहम अधिवेशन की मेजबानी की, जबकि 1939 में सुभाष चंद्र बोस ने फॉरवर्ड ब्लॉक की बैठक आयोजित की। आजादी के बाद जब जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल के खिलाफ ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया, तो यह मैदान जेपी आंदोलन को गति देने वाला प्रमुख केंद्र बन गया।

तिलक घाट, चेन्नई

-मरीना बीच पर स्थित तिलक घाट का नाम महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक के नाम पर रखा गया था। आजादी के आंदोलन के दौरान यह जगह विरोध-प्रदर्शन का एक अहम केंद्र थी, जहां महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और एनी बेसेंट जैसे कई बड़े नेताओं ने लोगों को संबोधित किया था। हालांकि, अब तिलक घाट विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगहों में शामिल नहीं है।

चेन्नई में वल्लुवर कोट्टम और स्वामी शिवानंद सलाई विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित अन्य प्रमुख जगहें थीं। मार्च 2025 में वल्लुवर कोट्टम में प्रदर्शन की अनुमति रद्द करने के बाद पुलिस ने स्वामी शिवानंद सलाई को विरोध-प्रदर्शन के लिए एक वैकल्पिक जगह के तौर पर निर्धारित किया।

बोट क्लब, दिल्ली

-जंतर-मंतर को एक वेधशाला के बजाय प्रदर्शन स्थल के तौर पर पहचान मिलने से पहले, संसद और राष्ट्रपति भवन के पास स्थित बोट क्लब का विशाल लॉन रैलियों, प्रदर्शनों और आंदोलनों का मुख्य केंद्र हुआ करता था।

महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में 1988 में हुए किसान आंदोलन के दौरान ट्रैक्टर और मवेशियों के साथ पांच लाख से ज्यादा लोगों की भारी भीड़ जुटी थी, जिसके बाद बोट क्लब पर विरोध-प्रदर्शनों पर रोक लगाने की शुरुआत हुई। वर्ष 1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बोट क्लब पर विरोध-प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

हालांकि, 2018 में अदालत के एक आदेश ने जंतर-मंतर के साथ-साथ इसे कुछ समय के लिए फिर से विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी।

लुटियंस दिल्ली की इन दो जगहों से चंद किलोमीटर की दूरी पर स्थित रामलीला मैदान भी विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगहों में शामिल है, लेकिन इसके लिए कुछ कीमत भी चुकानी पड़ती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1952 में जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह भारतीय संघ में शामिल करने की मांग को लेकर रामलीला मैदान से ही सत्याग्रह शुरू किया था। समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने 25 जून 1975 को (जब आपातकाल लागू हुआ था) यहां एक बड़ी रैली को संबोधित किया था।

अन्य शहरों में विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह

-लखनऊ : ईको गार्डन

-पणजी : आजाद मैदान, कैंपल परेड ग्राउंड

-हैदराबाद : धरना चौक, गन पार्क और लिवरी सर्कल

-जयपुर : शहीद स्मारक

भाषा पारुल सुरेश

सुरेश