Breaking News

अमित शाह मानहानि मामले में सुल्तानपुर कोर्ट ने राहुल गांधी को बरी किया     |   खड़गे के विवादित बयान पर भड़के बीजेपी कार्यकर्ता, पटना में बड़ा प्रोटेस्ट     |   राहुल गांधी के काफिले की गाड़ियां आपस में टकराईं, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर हादसा     |   UP: बस्ती में बाइक पर पलटा तेज रफ्तार से आ रहा ट्रक, तीन की मौत     |   आंध्र प्रदेश और दक्षिण ओडिशा की ओर बढ़ रहा चक्रवाती तूफान, ऑरेंज अलर्ट जारी     |  

बाघ के हमले में व्यक्ति की मौत या मृत्युदंड का सीधा प्रसारण देखना कितना उचित? विशेषज्ञ से जानिए

(जैकलीन बोएक्स, कर्टिन विश्वविद्यालय)

पर्थ, 13 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) हमारे लिए अब ऐसे लोगों की तस्वीरें और वीडियो देखना पहले से कहीं आसान हो गया है, जिन्हें चोट पहुंचाई जा रही हो, जिनके अंग क्षत-विक्षत हो गए हों या जिनकी हत्या कर दी गई हो। हाल में दो अलग-अलग और चर्चित घटनाओं ने मौत के भयावह दृश्यों को साझा किए जाने के मुद्दे पर ध्यान खींचा है।

ब्रिटेन के यॉर्कशायर स्थित एक वन्यजीव उद्यान में बाघ ने बाड़े में घुसे एक व्यक्ति को मार डाला। इस घटना के वीडियो व्यापक रूप से साझा किए गए। वहीं, अमेरिका का रक्षा विभाग 2009 में 13 निहत्थे सैनिकों की हत्या करने वाले निदाल हसन को दी जाने वाली मौत की सजा का सीधा प्रसारण करने की योजना बना रहा है।

हम अक्सर नेपाल में आई बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के फुटेज भी देखते हैं। इनमें लोगों को ऐसी परिस्थितियों में दिखाया जाता है, जहां उनके बचने की संभावना लगभग न के बराबर होती है।

कुछ लोगों का तर्क है कि प्रौद्योगिकी मंचों और समाचार माध्यमों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे दृश्य साझा न करें। लेकिन आम लोगों के बारे में क्या? क्या हमारी भी यह जिम्मेदारी है कि हम ऐसे वीडियो न तो साझा करें और न ही देखें?

बाघ के हमले में व्यक्ति की मौत के मामले में ब्रिटेन की पुलिस ने एक बयान जारी कर लोगों से ऑनलाइन प्रसारित हो रहे वीडियो साझा न करने की अपील की थी। इसके बावजूद कुछ समाचार वेबसाइट पर यह वीडियो देखा जा सकता है और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर इसे बड़े पैमाने पर साझा किया गया।

अमेरिका में मौत की सजा के प्रस्तावित सीधे प्रसारण के बारे में युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा, “लोगों को समझना चाहिए कि इस तरह के कृत्यों के गंभीर परिणाम होते हैं।” हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने कहा है कि मौत की सजा का सीधा प्रसारण “एक तरह से सार्वजनिक रूप से मृत्युदंड देने के समान होगा और यातना पर लगे पूर्ण प्रतिबंध का उल्लंघन करेगा।” अमेरिका के ‘रक्षा विभाग’ का नाम बदलकर अस्थायी रूप से ‘युद्ध विभाग’ किया गया है।

ऐसी सामग्री का प्रसारण करने या उसे साझा करने से जुड़े नैतिक सवाल मुख्य रूप से दो तरह के हैं। पहला, इससे होने वाले नुकसान से जुड़ा है और दूसरा, मानवीय गरिमा से। ये सवाल समाचार प्रसारकों और डिजिटल मंचों के साथ-साथ हममें से प्रत्येक व्यक्ति पर भी लागू होते हैं।

क्षति, अधिकार और गरिमा

हिंसक और भयावह दृश्य देखने से होने वाले नकारात्मक प्रभाव के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं। सोशल मीडिया पर हिंसक और वीभत्स वीडियो की निगरानी करने और उन्हें हटाने का काम करने वाले कर्मचारियों में ‘पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर’ (पीटीएसडी) की समस्या अधिक पाई जाती है। वहीं, ऑनलाइन ऐसे भयावह दृश्य देखने से बच्चों पर भी बुरा असर पड़ता है। इससे वे भावनात्मक रूप से परेशान हो सकते हैं और उनमें आक्रामक व्यवहार बढ़ सकता है।

ऐसे वीडियो देखने से अप्रत्यक्ष नुकसान भी हो सकता है। हिंसक मौतों के दृश्यों को तमाशे की तरह देखना करुणा जैसे मानवीय अहसास को कमजोर करता है। अरस्तू जैसे दार्शनिकों और नैतिकता के विचारकों का मानना है कि एक बेहतर और सार्थक जीवन जीने के लिए करुणा जैसे गुण आवश्यक हैं।

लेकिन उन लोगों के बारे में क्या, जो इन वीडियो में दिखाई देते हैं? किसी व्यक्ति की मौत के भयावह दृश्य देखना या साझा करना लगभग निश्चित रूप से उसकी निजता का उल्लंघन होगा और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाएगा।

दार्शनिक इमैनुएल कांट को नैतिकता के अधिकार-आधारित विचारों का प्रमुख संस्थापक माना जाता है। उनका तर्क था कि हर मनुष्य का अपना अंतर्निहित मूल्य और गरिमा होती है। कांट के विचारों का समर्थन करने वाले नैतिकता के विद्वान कहेंगे कि किसी व्यक्ति की मौत को सार्वजनिक तमाशा बनाना उसके अधिकारों और गरिमा का उल्लंघन है, क्योंकि ऐसा करके उस व्यक्ति को किसी दूसरे उद्देश्य की पूर्ति का साधन बना दिया जाता है।

यहां तक कि केवल सनसनीखेज जिज्ञासा के कारण ऐसे दृश्य देखना भी उस व्यक्ति की निजता के अधिकार की अनदेखी करना है।

अमेरिका में मौत की सजा के सीधे प्रसारण की योजना की आलोचना में मानवीय गरिमा का सवाल प्रमुख रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की क्यिनजॉम धोंगद्यू ने कहा, “मृत्युदंड को सार्वजनिक तमाशा बना देना सजा की क्रूरता को और बढ़ाता है।”

गरिमा का एक पहलू हममें से बाकी लोगों से भी जुड़ा है। हम सभी ऐसे समाज में रहना चाहते हैं, जहां मानवीय गरिमा को महत्व दिया जाता हो। यही वजह है कि ‘वन नेशन पार्टी’ के बरनबी जॉयस और ‘ग्रीन्स पार्टी’ की सारा हैनसन-यंग जैसे अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े दोनों नेताओं ने मौत की सजा के सीधे प्रसारण की योजना की निंदा की है।

क्या ऐसे दृश्य देखने के पक्ष में भी तर्क हैं?

क्या ऐसे कुछ कारण हो सकते हैं, जिनके कारण इन दृश्यों को देखना उचित या यहां तक कि अच्छा माना जाए? मेरा मानना है कि कुछ परिस्थितियों में ऐसा हो सकता है।

पहला कारण यह हो सकता है कि हम किसी घटना के साक्षी बनने और उसकी गवाही देने को अपना दायित्व समझें। ऐसा लगता है कि दूसरे विश्व युद्ध के अंत में जब समाचार पत्रों ने यातना शिविरों से बचे लोगों की तस्वीरें साझा की थीं, तो इसके पीछे यही भावना थी। ऐसे कई मामलों में हम इन भयावह घटनाओं को देखना और उन पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी समझते हैं, ताकि वे दोबारा न हों।

हालांकि, बाघ के हमले की घटना या सार्वजनिक रूप से मौत की सजा दिए जाने के मामले में ये दोनों तर्क लागू होते नहीं दिखते। लेकिन इनके आधार पर नेपाल में आई हालिया बाढ़ के दृश्य दिखाने को उचित ठहराया जा सकता है, जिसमें लोग बाढ़ के पानी में बह गए थे।

दूसरा कारण यह हो सकता है कि जब सरकार किसी व्यक्ति को मौत की सजा देती है या कोई अन्य अप्रिय कार्रवाई करती है, तो वह हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों के रूप में ऐसा करती है। इसलिए सरकार के कामकाज में पारदर्शिता हमारी दिलचस्पी होती है।

ये तर्क बाघ से जुड़ी घटना के वीडियो पर तो बिल्कुल लागू नहीं होते। मौत की सजा के मामले में भी अधिक से अधिक कुछ गवाहों की मौजूदगी को उचित ठहराया जा सकता है, न कि उसका सीधा प्रसारण करने को।

ऐसे वीडियो देखने के पक्ष में तीसरा तर्क यह दिया जा सकता है कि इससे दूसरे लोगों को भविष्य में अपराध करने से रोका जा सकता है। जाहिर है, यह तर्क बाघ के हमले या नेपाल में आई बाढ़ के मामलों में लागू नहीं होता, लेकिन मौत की सजा के मामले में इसे प्रासंगिक माना जा सकता है। निश्चित रूप से हेगसेथ का तर्क भी यही लगता है। हालांकि, इस दावे के समर्थन में बहुत कम प्रमाण हैं।

प्रौद्योगिकी के इस दौर में, जहां डिजिटल मंचों पर अक्सर बहुत कम नियमन होता है, ऐसे फैसले लेने की जिम्मेदारी धीरे-धीरे हम पर ही आ जाएगी। व्यक्तिगत रूप से हमारे पास प्रौद्योगिकी मंचों जितनी ताकत नहीं है, लेकिन हम सबके छोटे-छोटे फैसले मिलकर खुद हमारे और दूसरों के लिए बड़े नुकसान का कारण बन सकते हैं।

हमें रुककर यह सोचना चाहिए कि अगर हमारी मौत को कैमरे में कैद किया जा रहा होता और हमारी गरिमा या निजता दांव पर लगी होती, तो हम क्या चाहते। हमें यह भी विचार करना चाहिए कि ऐसे दृश्य देखने का हम पर क्या असर पड़ता है।

द कन्वरसेशन

खारी वैभव

वैभव