गुवाहाटी, 12 अक्टूबर (भाषा) सबसे कठिन दौर में भी उम्मीद की कहानियां जिंदा रहती हैं। मणिपुर में वर्षों से जारी संघर्ष की पृष्ठभूमि पर बनी मणिपुरी फीचर फिल्म ‘एनूंग नगल्लमदाई’ (अंधेरे में जुगनू) इसी आशा को पर्दे पर उतारने की कोशिश करती है।
फिल्म निर्माताओं के अनुसार, वैंकूवर अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में फिल्म का प्रीमियर हुआ। यह फिल्म तीन आपस में जुड़ी कहानियों के जरिए अस्तित्व की लड़ाई, मुश्किल हालात में डटे रहने की क्षमता और जीवटता को दर्शाती है। इसकी कहानियां 2023 में मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा के दौरान की घटनाओं पर आधारित हैं।
फिल्म की कहानी एक गर्भवती महिला के इर्द-गिर्द घूमती है जो चारों ओर गोलियों की आवाज के बीच बच्चे को जन्म देने के लिए संघर्ष कर रही है। दूसरी कहानी एक छोटे बालक की है जो अपनी मां की तलाश में भटक रहा है और उसके साथ एक बछड़ा है जो अपनी मां से बिछड़ चुका है। तीसरी कहानी एक कैफे की मालकिन की है जो अपनी जान जोखिम में डालकर जान बचाने के लिए भाग रहे लोगों को शरण देती है।
फिल्म का प्रीमियर छह अक्टूबर को 2026 के वैंकूवर अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (वीआईएफएफ) में हुआ। 85 मिनट की इस फिल्म को महोत्सव के ‘पैनोरमा सिनेमाज ऑफ एशिया’ खंड के तहत प्रदर्शित किया गया।
फिल्म के लेखक और निर्देशक योगेश लोहान ने कहा कि इस फिल्म की यात्रा मणिपुर में हिंसा से बचे लोगों से मुलाकात के साथ शुरू हुई।
उन्होंने कहा, ‘‘मैंने इस फिल्म पर सबसे पहले पटकथा लेखक के रूप में काम शुरू किया था। फिल्म का कोई भी दृश्य तय करने से पहले मैं मणिपुर गया और उन लोगों से मिला जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया था। मुझे उनकी पीड़ा और मानसिक आघात के साथ-साथ उनकी आंखों में अब तक मौजूद एक खामोश आशा की किरण ने सबसे अधिक प्रभावित किया। यही उम्मीद इस फिल्म की धड़कन बन गई।’’
लोहान ने बताया कि फिल्म की शूटिंग मणिपुर में वास्तविक स्थानों पर स्थानीय समुदायों के विश्वास और सहयोग से की गई।
फिल्म की निर्माता जानी विश्वनाथ ने कहा कि फिल्म तबाही के हाशिये पर खड़े लोगों पर नजर डालती है और यह सवाल उठाती है कि जब आसपास सब कुछ ठहर गया हो तब जीवन को आगे बढ़ाते रहने का क्या अर्थ है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह एक शांत लेकिन इस बात को दृढ़ता से याद दिलाती है कि उम्मीद की लौ कितनी भी टिमटिमाती क्यों न हो, वह हमेशा कायम रहने का रास्ता खोज लेती है।’’
भाषा सुरभि आशीष
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