नयी दिल्ली, 12 अक्टूबर (भाषा) विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पर विचार कर रही संसद की संयुक्त समिति ने सोमवार को इस विवादास्पद विधेयक पर ईसाई धर्मगुरुओं और चार्टर्ड अकाउंटेंट की राय जानी।
सूत्रों ने बताया कि ईसाई समुदाय के कुछ प्रतिनिधियों ने विधेयक के कुछ प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई और उन्हें हटाने की मांग की।
समिति के अध्यक्ष एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद संजय जायसवाल ने बैठक के बाद संवाददाताओं से कहा, ‘‘हमने सभी के बिंदुओं को ध्यानपूर्वक सुना है और जब हम समिति की बैठक में बैठेंगे तो सभी के सुझावों को शामिल कर उन पर चर्चा करेंगे।’’
समिति के समक्ष अपने विचार रखने वालों में कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई), ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल और सेंटर फॉर एडवांसमेंट ऑफ फिलैंथ्रॉपी के प्रतिनिधि शामिल थे।
यह विधेयक इस साल 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था और विपक्षी दलों की लगातार मांग के बाद इसे 12 अगस्त को संयुक्त समिति के पास भेज दिया गया था।
एफसीआरए विधेयक का कड़ा विरोध कर रहे विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि यह अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है, क्योंकि इसके कुछ प्रावधान ईसाई गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण एवं शैक्षणिक संस्थानों को मिलने वाली वैध वित्तीय सहायता को बाधित करेंगे।
सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए विपक्षी दलों को विधेयक का ऐसा एक भी प्रावधान बताने की चुनौती दी है, जो अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करता हो।
सरकार ने यह भी कहा है कि प्रस्तावित कानून किसी धर्म विशेष से संबंधित नहीं है और इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान को विनियमित करना है।
लोकसभा में विधेयक पेश करते हुए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि इस कानून का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और विदेश से प्राप्त धन का समुचित उपयोग सुनिश्चित करना है।
विधेयक को ‘‘खतरनाक’’ बताए जाने संबंधी विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए राय ने कहा था कि यह उन लोगों के लिए ‘‘वास्तव में खतरनाक’’ है, जो विदेशी अंशदान का इस्तेमाल ‘‘जबरन धर्मांतरण’’ के लिए करते हैं और उन लोगों के लिए भी जो निजी लाभ के वास्ते ‘‘विदेशी धन का दुरुपयोग’’ करते हैं।
विधेयक में देश में गैर-सरकारी संगठनों और विदेशी वित्तपोषण पर सरकार की निगरानी और कड़ी करने का प्रस्ताव है। इसमें किसी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द होने की स्थिति में उसकी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान के लिए एक प्राधिकरण बनाने का भी प्रावधान है।
भाषा हक दिलीप
दिलीप