प्रयागराज, 12 अक्टूबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विधि आयोग से भारत की सामाजिक वास्तविकताओं की समीक्षा करने के बाद नाबालिग जोड़ों से जुड़े मामलों में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून में उचित संशोधन की सिफारिश करने को कहा है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने कहा कि कुछ विशेष परिस्थितियों में कानून को सख्ती से लागू करने से ऐसे परिणाम सामने आ सकते हैं, जो न्याय के बजाय अन्याय को बढ़ावा दें, खासकर तब, जब ऐसे संबंध से किसी बच्चे का जन्म हुआ हो।
अदालत ने राकेश यादव नामक व्यक्ति की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता ने अदालत से अपनी पत्नी को पेश करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
अदालत ने कहा, ‘‘कानून बनाते समय भारत की सामाजिक वास्तविकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया प्रतीत होता है। यहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा अनपढ़ या कम पढ़ा-लिखा है और संभव है कि उसे कानून तथा संविधान के तहत मिले अधिकारों की जानकारी भी न हो।’’
अदालत ने लड़की और उसके पिता से बातचीत के बाद यह टिप्पणी की। लड़की ने बताया कि उसने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की है, वह समाचार पत्र नहीं पढ़ सकती और केवल हस्ताक्षर कर सकती है। उसके पिता ने बताया कि वह कभी स्कूल नहीं गए।
इस मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत मामला लंबित है। लड़की उसके साथ घर से भाग गई थी और बाद में उसने एक बच्चे को जन्म दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली।
अदालत ने विधि आयोग से उन मामलों में सामुदायिक सेवा सहित सजा के वैकल्पिक तरीकों पर विचार करने को भी कहा, जिनमें पॉक्सो कानून की जानकारी के अभाव में परिवारों के अनावश्यक रूप से टूटने का खतरा हो।
पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में मानवीय विकास और कानून की सख्ती के बीच टकराव दिखाई देता है। उसने कहा कि लगभग 15 वर्ष की उम्र में शारीरिक और भावनात्मक परिपक्वता आने के साथ किसी अन्य व्यक्ति के प्रति आकर्षण महसूस करना स्वाभाविक है।
हालांकि, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नाबालिग के बालिग होने तक उसकी शिक्षा जारी रहे और उसे व्यावसायिक कौशल हासिल करने तथा आत्मनिर्भर बनने के पर्याप्त अवसर मिलें।
मामले के तथ्यों के अनुसार, यह जोड़ा घर से भाग गया था और एक सितंबर, 2025 को हलफनामा देकर खुद को पति-पत्नी घोषित किया था। हालांकि, लड़की के पिता ने बताया कि उसकी बेटी की जन्मतिथि 25 जुलाई, 2010 है। लड़की के बरामद होने के बाद उसे बालिका गृह भेज दिया गया, जहां उसने एक बच्चे को जन्म दिया।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में स्कूल या नगर निकाय अथवा पंचायत की ओर से जारी जन्म प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था।
भाषा
सं, राजेंद्र रवि कांत