नयी दिल्ली, 12 अक्टूबर (भाषा) दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान यातायात और आवाहाजी पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर अधिकारियों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका का विरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय में एक आवेदन दाखिल किया गया है, जिसमें कहा गया है कि लोगों को इकट्ठा होने के अधिकार के नाम पर सार्वजनिक व्यवस्था और यात्रियों की आवाजाही के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह याचिका उच्चतम न्यायालय में जारी अवमानना की कार्यवाही के बीच दाखिल की गई है।
रविवार को न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ ने कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के विरोध प्रदर्शन के दौरान मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगाए जाने के खिलाफ दिए गए निर्देशों का कथित रूप से पालन नहीं करने के मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था।
दिल्ली के निवासी सतीश कुमार अग्रवाल ने अपने वकील अनंत नारायण एम. जी. के माध्यम से इस मामले में हस्तक्षेप आवेदन दाखिल किया है।
आवेदक ने कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना संविधान के तहत संरक्षित अधिकार है, लेकिन इसके साथ संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत नागरिकों के स्वतंत्र आवागमन के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
आवेदक ने कहा है कि छह अक्टूबर से हो रहे प्रदर्शनों के कारण जनपथ और संसद मार्ग समेत लुटियंस दिल्ली की प्रमुख सड़कों पर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिससे दफ्तर जाने वाले लोगों, छात्रों और मरीजों को काफी परेशानी हो रही है।
याचिका में कहा गया है, “मौजूदा कार्यवाही में उचित राहत तय करते समय उन नागरिकों के हितों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, जो विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं हैं। इनमें बुजुर्ग, मरीज, दिव्यांग व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं, छात्र, कर्मचारी और सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर लोग शामिल हैं।”
याचिका में उच्चतम न्यायालय के 2018 के मजदूर किसान शक्ति संगठन मामले और 2012 के रामलीला मैदान मामले के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं और पुलिस के पास अव्यवस्था रोकने के लिए कानून के तहत जरूरी निर्णय लेने का अधिकार बना रहना चाहिए।
भाषा जोहेब नरेश
नरेश
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