(वर्षा सागी)
नयी दिल्ली, 12 अक्टूबर (भाषा) देश के अलग-अलग कोनों के लोग दशकों से अपनी असहमति जाहिर करने के लिए नयी दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटते रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता था कि यह एक ऐसी जगह है, जहां से उनकी आवाज राजनेताओं या नीति-निर्माताओं के कानों तक जाएगी।
लेकिन लगता है कि दशकों तक देश में असहमति जाहिर करने के सबसे चर्चित स्थानों में से एक रहे जंतर-मंतर की भूमिक अब बदल जाएगी क्योंकि विरोध प्रदर्शन करने के निर्धारित स्थलों की सूची से इसे हटा दिया गया है।
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने 11 अक्टूबर को जारी एक स्थायी आदेश के तहत जंतर-मंतर रोड को निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया।
उन्होंने इसके साथ ही प्रदर्शनों के लिए तीन नए स्थानों मध्य दिल्ली में रामलीला मैदान, उत्तर दिल्ली में बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली में सीबीडी मैदान को नामित किया।
हालांकि, राजधानी में विरोध प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र के रूप में जंतर-मंतर का उभार भी सार्वजनिक रूप से असहमति जताने के लिए निर्धारित जगहों में समय-समय पर हुए बदलावों के लंबे इतिहास का हिस्सा था।
आजादी के बाद कई दशकों तक इंडिया गेट के पास बोट क्लब के लॉन और विजय चौक दिल्ली में बड़े विरोध प्रदर्शनों के प्रमुख स्थलों में शामिल थे।
प्रदर्शनकारी लाल किले के पीछे भी कई-कई दिनों तक डेरा डालकर बैठे रहते थे और सत्ता में बैठे लोगों से अपनी मांगों पर ध्यान दिए जाने का इंतजार करते थे।
इतिहासकार सोहेल हाशमी ने बताया कि दिल्ली में सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों की परंपरा कई दशक पुरानी है।
उन्होंने बताया कि पहले बोट क्लब से इंडिया गेट तक का पूरा इलाका बड़ी सभाओं से भर जाता था।
अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने बोट क्लब के लॉन में किसानों की विशाल सभा का नेतृत्व किया था।
हजारों किसान अपने मवेशियों के साथ कई दिनों तक वहां डटे रहे।
इससे तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर उनकी मांगों पर ध्यान देने का दबाव बना।
इस आंदोलन के बाद इस बात पर बहस तेज हो गई कि कौन विरोध प्रदर्शन कर सकता है और इसके लिए किन जगहों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
किसानों की भारी भीड़, प्रमुख सरकारी प्रतिष्ठानों के पास प्रदर्शन होने और सुरक्षा तथा कानून-व्यवस्था को लेकर चिंताओं के कारण अधिकारियों ने बोट क्लब को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में इस्तेमाल करने पर फिर से विचार किया।
इसके बाद प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगाई गईं और 1993 तक जंतर-मंतर एक वैकल्पिक स्थल के रूप में उभरा।
जंतर-मंतर ऐसी जगह थी, जहां प्रदर्शनकारी सरकार का ध्यान खींचने के लिए सत्ता के केंद्र के काफी करीब रह सकते थे। साथ ही, बोट क्लब के विशाल लॉन की तुलना में यहां प्रदर्शन का प्रबंधन करना भी आसान था।
उच्चतम न्यायालय ने जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले में दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के स्थलों में हुए बदलाव का जिक्र किया था।
इसमें रामलीला मैदान से बोट क्लब और अंततः जंतर-मंतर तक प्रदर्शनों के स्थान बदलने का उल्लेख था।
फैसले में कहा गया कि पुलिस ने बोट क्लब से प्रदर्शनों को इसलिए हटाया था, क्योंकि उनसे यातायात बाधित हो रहा था।
पुलिस ने जंतर-मंतर को पांच हजार तक लोगों की सभाओं के लिए निर्धारित किया था, जबकि इससे बड़ी सभाएं रामलीला मैदान में होनी थीं।
वर्षों के दौरान जंतर-मंतर राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, ट्रेड यूनियनों, किसानों, कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के लिए विरोध प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र बन गया।
भ्रष्टाचार और महिलाओं की सुरक्षा से लेकर शिक्षा, चुनाव सुधार और किसानों की मांगों तक के मुद्दों पर हुए प्रदर्शनों ने सड़क के इस हिस्से को जन लामबंदी के एक परिचित स्थल के रूप में पहचान दिलाई।
हालांकि, इस स्थल का इतिहास आधुनिक भारतीय राजनीति में इसकी भूमिका से कहीं अधिक पुराना है।
जंतर-मंतर का निर्माण 1724 में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के शासनकाल में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने खगोलीय वेधशाला के रूप में कराया था।
यहां सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र और राम यंत्र सहित पत्थर व चूने से बने विशाल उपकरण हैं, जिन्हें खगोलीय पिंडों की गति मापने और उनकी स्थिति की गणना करने के लिए तैयार किया गया था।
कई सदियों बाद, वेधशाला के बाहर की सड़क की एक अलग पहचान बन गई। यह ऐसी जगह बन गई, जहां नागरिक सत्ता में बैठे लोगों से सवाल करने के लिए जुटने लगे।
हालांकि, प्रदर्शनों की बढ़ती संख्या के साथ स्थानीय निवासियों की शिकायतें भी बढ़ने लगीं।
इनमें शोर, कचरा, अस्थायी ढांचे और प्रदर्शनकारियों के लंबे समय तक वहां डेरा डालकर रहने जैसी समस्याएं शामिल थीं।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पांच अक्टूबर 2017 को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाने का आदेश दिया और अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया।
उच्चतम न्यायालय ने जुलाई 2018 में प्रदर्शनों पर लगाई गई इस पूर्ण पाबंदी को रद्द कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि पूरी तरह से रोक लगाना समाधान नहीं है।
शीर्ष अदालत ने नागरिकों के विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार और स्थानीय निवासियों के शांतिपूर्वक रहने के अधिकार के बीच संतुलन बनाते हुए प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने की जरूरत बताई।
न्यायालय ने प्रदर्शनकारियों की संख्या सीमित करने, प्रदर्शनों के लिए विशिष्ट क्षेत्र तय करने, लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को नियंत्रित करने और लंबे समय तक डेरा डालने से रोकने जैसे उपाय सुझाए।
इस फैसले के बाद दिल्ली पुलिस ने दिशा-निर्देश जारी किए, जिनके तहत कुछ पाबंदियों के साथ जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों की अनुमति दी गई।
इन दिशा-निर्देशों में प्रदर्शनकारियों की संख्या सीमित करने का प्रावधान भी शामिल था।
बड़ी सभाएं रामलीला मैदान में की जा सकती थीं।
जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के हालिया आदेश में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से गठित एक समिति का उल्लेख किया गया है।
इस समिति को मौजूदा निर्धारित स्थल के स्थान पर नागरिकों के विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए वैकल्पिक जगहों की पहचान करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
आदेश में कहा गया कि समिति की सिफारिशों के आधार पर जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया।
जंतर-मंतर के बजाय रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी मैदान को नए स्थल के रूप में निर्धारित किया गया है।
भाषा जितेंद्र संतोष
संतोष