( किम्बर्ली डी आर्डेनी, एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिट के मनोविज्ञान विभाग में सहायक अनुसंधान प्राध्यापक )
टेम्पे (अमेरिका), 12 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) मानव मस्तिष्क की जटिल कार्यप्रणाली को समझना वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से चुनौती रहा है। मस्तिष्क के महज एक घन मिलीमीटर हिस्से में हजारों न्यूरॉन और उन्हें सहारा देने वाली अन्य कोशिकाएं मौजूद होती हैं, जो एक-दूसरे की गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। हालांकि, तकनीकी प्रगति ने अब वैज्ञानिकों के लिए मस्तिष्क की संरचना को समझने के साथ-साथ उसकी गतिविधियों को नियंत्रित करने के नए रास्ते खोल दिए हैं।
इसी दिशा में ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसमें प्रकाश की मदद से न्यूरॉन की गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता है। इस तकनीक के विकास का मार्ग प्रशस्त करने वाले अनुसंधानकर्ताओं को चिकित्सा के क्षेत्र में 2026 का नोबेल पुरस्कार मिला है।
ऑप्टोजेनेटिक्स के जरिये वैज्ञानिक मिलीसेकंड के स्तर पर न्यूरॉन की गतिविधियों में बदलाव कर सकते हैं। इससे भविष्य में दृष्टि बहाल करने, दर्द कम करने तथा मिर्गी और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों के उपचार की संभावनाएं पैदा हुई हैं।
--- मस्तिष्क की संरचना को समझने में तकनीक की भूमिका ---
न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में तकनीकी विकास मोटे तौर पर तीन चरणों में हुआ है—मस्तिष्क की संरचना को देखना, उसकी गतिविधियों को मापना और फिर उन्हें नियंत्रित करना।
उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में स्पेनिश वैज्ञानिक सैंटियागो रेमन वाई कैजल ने सूक्ष्मदर्शी की मदद से न्यूरॉन की संरचना का अध्ययन किया। इसके लिए मस्तिष्क के ऊतकों को चांदी के लवणों से रंगा जाता था, ताकि अलग-अलग न्यूरॉन स्पष्ट दिखाई दे सकें। इस तकनीक को इतालवी तंत्रिका विज्ञानी कैमिलो गोल्जी ने विकसित किया था।
कैजल ने न्यूरॉन के बीच संपर्कों और उनके एक-दूसरे को प्रभावित करने के तरीके को समझने की कोशिश की। उनके शोध ने मस्तिष्क में सीखने और याद रखने की प्रक्रिया को समझने की नींव रखी। कैजल और गोल्जी को 1906 में शरीर विज्ञान या चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।
1970 के दशक में विकसित एंटेरोग्रेड और रेट्रोग्रेड ट्रेसिंग तकनीकों से वैज्ञानिकों को मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच तंत्रिका मार्गों का नक्शा तैयार करने में मदद मिली।
आज इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी और एक्सपैंशन माइक्रोस्कोपी जैसी तकनीकों के जरिये मस्तिष्क की संरचना को अधिक बारीकी से देखा जा सकता है। इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी में इलेक्ट्रॉनों की धारा का इस्तेमाल करके बेहद सूक्ष्म संरचनाओं की तस्वीरें बनाई जाती हैं। वहीं, एक्सपैंशन माइक्रोस्कोपी में विशेष जेल की मदद से ऊतक के नमूने को बड़ा किया जाता है, जिससे कोशिकाओं और उनके बीच संपर्कों का अध्ययन आसान हो जाता है।
इन तकनीकों के साथ कृत्रिम मेधा (एआई) आधारित एल्गोरिदम ने वैज्ञानिकों को मस्तिष्क की जटिल संरचना समझने में मदद की है। इस क्षेत्र में न्यूरॉन के बीच सभी संपर्कों का नक्शा तैयार करने के अध्ययन को 'कनेक्टोमिक्स' कहा जाता है।
एमआरआई ने भी मस्तिष्क के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फंक्शनल एमआरआई (एफएमआरआई) के माध्यम से वैज्ञानिक पूरे मस्तिष्क में रक्त प्रवाह को मापकर उसकी गतिविधियों का आकलन कर सकते हैं। वर्ष 2003 में एमआरआई तकनीक के विकास में योगदान देने वाले शोध को चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
--- न्यूरॉन की गतिविधियों को मापने में प्रगति ---
मस्तिष्क की संरचना को देखने के साथ-साथ उसकी विद्युत गतिविधियों को मापने की तकनीकों ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि न्यूरॉन एक-दूसरे तक संदेश कैसे पहुंचाते हैं।
वैज्ञानिक एलन हॉजकिन और एंड्रयू हक्सले को न्यूरॉन से उत्पन्न विद्युत आवेगों को दर्ज करने और मापने से जुड़े उनके काम के लिए 1963 में नोबेल पुरस्कार दिया गया था। न्यूरॉन इन विद्युत संकेतों को प्रसारित करके एक-दूसरे से संवाद करते हैं। आज वैज्ञानिक ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं, जिनसे मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों न्यूरॉन की विद्युत गतिविधियों को एक साथ दर्ज किया जा सकता है।
वर्ष 2025 में प्रकाशित अध्ययनों की एक शृंखला में बताया गया कि जब कोई जानवर निर्णय ले रहा होता है, तब उसके मस्तिष्क का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा इस प्रक्रिया में सक्रिय रहता है। इससे संकेत मिलता है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में केवल मस्तिष्क के उन हिस्सों के न्यूरॉन शामिल नहीं होते, जिन्हें आमतौर पर इस कार्य से जोड़ा जाता है।
---- न्यूरॉन को नियंत्रित करने की तकनीकें ----
विशिष्ट न्यूरॉन की गतिविधियों को नियंत्रित करने की दिशा में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन तकनीक भी महत्वपूर्ण रही है। फ्रांसीसी न्यूरोसर्जन अलीम-लुई बेनाबिद ने 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में पार्किंसन रोग के लक्षण कम करने के लिए इस तकनीक को विकसित किया था।
डीप ब्रेन स्टिमुलेशन मस्तिष्क की गतिविधियों के लिए पेसमेकर की तरह काम करता है। इसमें मस्तिष्क में इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करके विद्युत संकेत दिए जाते हैं। आज शोधकर्ता ओसीडी, गंभीर अवसाद और जरूरत से ज्यादा खाने की समस्या जैसे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों के उपचार में भी इसके संभावित इस्तेमाल का अध्ययन कर रहे हैं।
हालांकि, इस तकनीक की एक सीमा है। प्रत्यारोपित इलेक्ट्रोड आसपास की कई कोशिकाओं को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण वैज्ञानिक मस्तिष्क की गतिविधियों को अधिक सटीक तरीके से नियंत्रित करने वाली तकनीकें विकसित कर रहे हैं।
ऑप्टोजेनेटिक्स इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस तकनीक में न्यूरॉन तक आनुवंशिक निर्देश पहुंचाने के लिए एक हानिरहित वायरस का इस्तेमाल किया जाता है। इससे न्यूरॉन में ऐसे प्रोटीन बनते हैं, जो प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं। इसके बाद विशेष रंग की रोशनी डालकर चुने हुए न्यूरॉन की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
----- वायरस और रासायनिक पदार्थों से नियंत्रण -----
ऑप्टोजेनेटिक्स के अलावा 'डिजाइनर रिसेप्टर्स एक्सक्लूसिवली एक्टिवेटेड बाय डिजाइनर ड्रग्स' (डीआरईएडीडी) तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें भी हानिरहित वायरस के जरिये न्यूरॉन तक निर्देश पहुंचाए जाते हैं, ताकि उनके रासायनिक रिसेप्टर में बदलाव हो सके और वे विशेष दवाओं के प्रति प्रतिक्रिया दें।
ऑप्टोजेनेटिक्स में प्रकाश के जरिये न्यूरॉन को नियंत्रित किया जाता है, जबकि डीआरईएडीडी में रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल होता है। दोनों तकनीकों का उद्देश्य मस्तिष्क के खास हिस्सों में न्यूरॉन की गतिविधियों को अधिक सटीक तरीके से नियंत्रित करना है।
कई नैदानिक परीक्षणों में यह पता लगाया जा रहा है कि डीआरईएडीडी तकनीक का इस्तेमाल पार्किंसन रोग, मिर्गी और तंत्रिका संबंधी दर्द के उपचार में किया जा सकता है या नहीं।
----- बीमारियों के उपचार की नई संभावनाएं -----
शोधकर्ता ऑप्टोजेनेटिक्स के संभावित चिकित्सकीय इस्तेमाल का भी अध्ययन कर रहे हैं। इसमें दृष्टि हानि, अल्जाइमर रोग, पार्किंसन रोग, मिर्गी, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, मधुमेह और कैंसर जैसी स्थितियां शामिल हैं। हालांकि, इन बीमारियों में इस तकनीक की प्रभावशीलता और सुरक्षा को लेकर अभी और शोध की जरूरत है।
भविष्य में प्रकाश आधारित उपचार की मदद से दृष्टि बहाल करने या तंत्रिका तंत्र से जुड़ी कुछ बीमारियों की प्रगति को रोकने की संभावना है। इसी तरह, विशेष दवाओं के संयोजन से चिंता कम करने और मिर्गी का उपचार करने के नए तरीके विकसित हो सकते हैं।
ये संभावनाएं दशकों से जारी उस शोध का परिणाम हैं, जिसके तहत वैज्ञानिक मस्तिष्क के उन हिस्सों की पहचान करने और उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने के तरीके विकसित कर रहे हैं, जहां सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि मस्तिष्क की संरचना को देखने, उसकी गतिविधियों को मापने और फिर उन्हें नियंत्रित करने की तकनीकों में हुई प्रगति से भविष्य में तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों के उपचार के नए रास्ते खुल सकते हैं।
द कन्वरसेशन
मनीषा वैभव
वैभव