( फाकिर हसन )
जोहानिसबर्ग, 12 अक्टूबर (भाषा) भारत पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के प्रयासों के तहत दक्षिण अफ्रीका के एक विश्वविद्यालय में आयुष की पीठ स्थापित करना चाहता है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने यह जानकारी दी।
प्रस्तावित आयुष पीठ डरबन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी में स्थापित की जाएगी। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य शिक्षा में आयुर्वेद और आयुष की अन्य चिकित्सा पद्धतियों को शामिल करना तथा दोनों देशों के बीच शैक्षणिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।
आयुष मंत्रालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की संयुक्त सचिव मोनल दास ने सप्ताहांत में डरबन में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में कहा कि भारत इस पीठ की स्थापना के लिए पहले ही एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर कर चुका है।
उन्होंने कहा, “अगर दक्षिण अफ्रीकी सरकार सहमत होती है, तो हम इसकी स्थापना कर सकते हैं।”
आयुष में भारत की पारंपरिक और पूरक चिकित्सा पद्धतियां आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध तथा होम्योपैथी शामिल हैं।
दास ने बताया कि मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया और मॉरीशस में भारत पहले ही ऐसी पीठ स्थापित कर चुका है, जबकि कई अन्य देशों में भी इसी तरह की पहल की जा रही है।
उन्होंने कहा कि इन पीठ की स्थापना का उद्देश्य आयुष से जुड़े ज्ञान को वैश्विक स्वास्थ्य शिक्षा में शामिल करना और चिकित्सा पेशेवरों को मरीजों के उपचार में एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने में सक्षम बनाना है।
दास ने दोनों देशों में पारंपरिक दवाओं की उपलब्धता और उनके इस्तेमाल को सुगम बनाने के लिए पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों तथा फार्माकोपिया मानकों को परस्पर मान्यता देने की भी अपील की।
आयुर्वेदिक दवाओं की सुरक्षा, प्रभाव और गुणवत्ता मानकों से जुड़ी चिंताओं पर उन्होंने कहा कि भारत में बाजार में उपलब्ध दवाओं के नियमन के लिए व्यवस्था मौजूद है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और अन्य अफ्रीकी देशों को अपने नियामक ढांचे विकसित करने में भारत की सहायता की पेशकश भी की।
दास ने कहा कि अनुसंधान, निवारक स्वास्थ्य देखभाल तथा आयुष उत्पादों और हर्बल दवाओं का व्यापार भारत-अफ्रीका सहयोग बढ़ाने के संभावित क्षेत्र हैं।
सम्मेलन के दौरान डरबन में भारत के महावाणिज्यदूत नितिन सुभाष येओला ने भारतीय वाणिज्य दूतावास में आयुष सूचना प्रकोष्ठ शुरू किए जाने की घोषणा की।
येओला ने कहा कि यह प्रकोष्ठ डरबन, क्वाजुलु-नताल और आसपास के प्रांतों में आयुष तथा पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े मुद्दों पर संपर्क का प्रमुख केंद्र होगा। यह दक्षिण अफ्रीका के संबंधित पक्षों को भारत के उपयुक्त संस्थानों से जोड़ने में भी मदद करेगा।
इस बीच, दक्षिण अफ्रीकी अधिकारी तंदाजा शांडू ने कहा कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि स्थानीय समुदायों को पारंपरिक ज्ञान का उचित लाभ मिले और उसे नष्ट होने या व्यावसायिक दुरुपयोग से बचाया जाए।
भाषा मनीषा वैभव
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