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पीड़ितों के लिए भरोसेमंद ठिकाना बना एनएचआरसी : सीजेआई सूर्यकांत

नयी दिल्ली, 12 अक्टूबर (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) पीड़ितों के लिए एक ‘विश्वसनीय ठिकाने’ के रूप में विकसित हुआ है और किसी मानवाधिकार संस्थान की वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं है कि वह कितने मामलों का निपटारा करता है बल्कि यह भी है कि क्या उन लोगों की आवाज वहां सुनी जा सकती है, जो अपनी बात कहने में सबसे कम सक्षम हैं।

सीजेआई यहां विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के 33वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि 33 साल पहले संसद ने मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए इस आयोग की स्थापना की थी। तब से लेकर अब तक यह पीड़ितों के लिए एक विश्वसनीय ठिकाना बन गया है।

सीजेआई ने कहा, ‘‘यदि संविधान एक वादा है, तो आयोग उसके संरक्षकों में से एक है। यह उन जगहों तक पहुंचता है, जहां अदालत के लिए आसानी से पहुंचना संभव नहीं होता। यह उन लोगों की बात सुनता है, जो आसानी से अपनी आवाज नहीं उठा सकते और किसी के अनुरोध का इंतजार किए बिना खुद भी कार्रवाई कर सकता है।’’

हिरासत में यातना या मौत, बंधुआ मजदूरी, औद्योगिक इकाइयों में काम करने के कारण सिलिकोसिस की बीमारी होने और वंचित समुदायों के अधिकारों की रक्षा से जुड़े मामलों में एनएचआरसी के हस्तक्षेप का उल्लेख करते हुए सीजेआई ने कहा कि ये उदाहरण दर्शाते हैं कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल उल्लंघन की पहचान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘इसके तहत जवाबदेही तय करने, प्रभावित लोगों को सार्थक राहत दिलाने और उल्लंघन की पुनरावृत्ति रोकने के लिए बदलाव सुनिश्चित करने का प्रयास भी होना चाहिए।’’

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि किसी मानवाधिकार संस्थान का प्रभाव उसके आदेशों को जबरन लागू कराने की ताकत से नहीं, बल्कि समय के साथ अर्जित उसकी विश्वसनीयता से आता है।

उन्होंने कहा, ‘‘इसकी नैतिक साख बैंक खाते में जमा राशि की तरह होती है। यह धीरे-धीरे, एक-एक पैसा जमा कर बनती है और बहुत तेजी से खर्च हो सकती है। सावधानीपूर्वक की गई हर जांच, समय पर किए गए हस्तक्षेप और हर ईमानदार रिपोर्ट से इस साख में इजाफा होता है।’’

सीजेआई ने कहा कि संविधान हमसे एक बेहद व्यावहारिक सवाल पूछता है कि कतार में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति का जीवन कैसा है?

उन्होंने कहा कि जो अधिकार शक्तिशाली लोगों के लिए तो कारगर हों, लेकिन कमजोर लोगों के लिए विफल हो जाएं, वे वास्तविक अर्थों में अधिकार नहीं हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘यह बेहतर ब्रांडिंग के साथ पेश किया गया विशेषाधिकार है। इसलिए किसी मानवाधिकार संस्थान की वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं है कि वह कितने मामलों का निपटारा करता है, बल्कि यह भी है कि क्या उन लोगों की आवाज वहां सुनी जा सकती है, जो अपनी बात कहने में सबसे कम सक्षम हैं।’’

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यम सहित अन्य लोगों ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया।

सीजेआई ने कहा कि अपने 33 वर्षों के दौरान एनएचआरसी ने 24 लाख से अधिक मामले दर्ज किए हैं और 23 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया है। मामलों के निपटारे की दर 98 प्रतिशत से अधिक रही है।

उन्होंने कहा कि ये आंकड़े केवल संस्थागत कामकाज का परिणाम नहीं दर्शाते, बल्कि उन अनेक अवसरों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जब मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के मामले सार्वजनिक रूप से सामने आए।

प्रधान न्यायाधीश ने ‘जीवन का अमृत जल: जल के अधिकार के माध्यम से मानवीय गरिमा को आगे बढ़ाना’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन के साथ स्थापना दिवस समारोह आयोजित करने के लिए एनएचआरसी की सराहना की।

उन्होंने कहा कि जल केवल जीवन का अमृत नहीं है, बल्कि मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से इसका महत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है।

सीजेआई ने कहा कि जिस समुदाय को भरोसेमंद तरीके से पानी उपलब्ध नहीं होता, वह संविधान द्वारा सुनिश्चित गरिमा का पूरी तरह आनंद नहीं ले सकता।

उन्होंने कहा कि भारत ने लोगों तक पेयजल की पहुंच बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किए हैं। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर नल कनेक्शन उपलब्ध कराना भी शामिल है।

सीजेआई ने कहा, ‘‘संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए। मानवाधिकार आयोगों को शिकायतों की जांच करनी चाहिए, व्यवस्था की खामियों की पहचान करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन चिंताओं पर अन्यथा ध्यान नहीं जाता, उन्हें संस्थागत स्तर पर गंभीरता से लिया जाए।’’

उन्होंने एनएचआरसी इंडिया मोबाइल ऐप शुरू करने और अपने रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने की दिशा में उठाए गए कदमों के लिए भी आयोग की सराहना की।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘मुझे उम्मीद है कि एनएचआरसी न्याय के मार्ग को रोशन करता रहेगा, अपनी पहुंच बढ़ाएगा तथा अपने प्रभाव को और मजबूत करेगा।’’

भाषा गोला मनीषा

मनीषा