नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर (भाषा) दिल्ली-एनसीआर के विशेषज्ञों ने कहा है कि वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क में रहने से महिलाओं के प्रजनन अंगों में कैंसर होने का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने पीएम 2.5 के संपर्क, प्रजनन स्वास्थ्य और महिलाओं के प्रजनन तंत्र के कैंसर के बीच संभावित संबंधों पर हो रहे शुरुआती शोध का हवाला दिया।
विशेषज्ञों ने बताया कि स्त्री रोग संबंधी कैंसर का कोई एक कारण नहीं होता। उन्होंने कहा कि पर्यावरण से जुड़े कारक भी शरीर में कैंसर विकसित होने की जैविक प्रक्रिया में योगदान दे सकते हैं।
फोर्टिस गुरुग्राम में स्त्री कैंसर सर्जन और स्त्री कैंसर विज्ञान एवं रोबोटिक सर्जरी विभाग की अध्यक्ष डॉ. रमा जोशी ने कहा, 'पीएम2.5 ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने का संबंध सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव और शरीर पर पड़ने वाले व्यापक जैविक प्रभावों से है।'
उन्होंने कहा कि हाल के अध्ययनों में वायु प्रदूषण और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य के कुछ पहलुओं के बीच संबंध सामने आए हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या पर्यावरण के संपर्क में रहने का महिलाओं में कैंसर के समग्र जोखिम से जुड़े कारकों पर भी असर पड़ सकता है।
जोशी ने कहा कि प्रदूषण के संपर्क में आने और कैंसर के बीच संबंध होने का मतलब यह नहीं है कि प्रदूषण सीधे तौर पर कैंसर का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के प्रजनन अंगों के कैंसर के मामले में इस संबंध को लेकर अभी शोध जारी है और अलग-अलग अध्ययनों के निष्कर्ष एक जैसे नहीं रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदूषण और कैंसर के बीच कारणात्मक संबंध के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले भारत से जुड़े और अधिक आंकड़ों की जरूरत है।
उन्होंने कहा, 'महिलाओं को उन जोखिम कारकों पर ध्यान देना चाहिए, जिनमें बदलाव किया जा सकता है या जिनकी निगरानी की जा सकती है। स्वस्थ वजन बनाए रखना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना, मधुमेह और चयापचय से जुड़ी अन्य समस्याओं को नियंत्रित करना, परिवार में बीमारियों के इतिहास को समझना और असामान्य रक्तस्राव होने पर समय पर चिकित्सकीय जांच कराना महत्वपूर्ण है। पर्यावरण प्रदूषण एक अतिरिक्त चिंता है, जिस पर और वैज्ञानिक शोध किए जाने की जरूरत है।'
विशेषज्ञों ने भारत में महिलाओं के पर्यावरणीय संपर्क और प्रजनन स्वास्थ्य के बीच संबंधों की जांच करने वाले एक हालिया देशव्यापी अध्ययन का भी उल्लेख किया।
इस अध्ययन में बताया गया कि जिन महिलाओं के पीएम2.5 के संपर्क का स्तर 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक था, उनमें पहली बार मासिक धर्म शुरू होने में देरी की आशंका 24 प्रतिशत अधिक थी, जबकि समय से पहले रजोनिवृत्ति होने का जोखिम 23 प्रतिशत अधिक पाया गया।
शोधकर्ताओं ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के साथ उपग्रह से प्राप्त पीएम2.5 के अनुमान और पर्यावरण से जुड़े अन्य संकेतकों का विश्लेषण किया।
अध्ययन में पहली बार मासिक धर्म शुरू होने की उम्र के विश्लेषण के लिए 15 से 24 वर्ष की करीब एक लाख 80 हजार महिलाओं और रजोनिवृत्ति के विश्लेषण के लिए 30 से 49 वर्ष की करीब तीन लाख महिलाओं के आंकड़े शामिल किए गए। उत्तर भारत के क्षेत्रों में ये संबंध अधिक मजबूत पाए गए, जिनमें दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे निष्कर्ष इस बात को लेकर वैज्ञानिकों की रुचि बढ़ा रहे हैं कि वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क में रहने से महिलाओं के हार्मोन संबंधी और प्रजनन तंत्र से जुड़े जैविक मार्ग किस तरह प्रभावित हो सकते हैं।
शोधकर्ता यह भी जांच कर रहे हैं कि पीएम2.5 से जुड़े जैविक प्रभाव, जिनमें लंबे समय तक रहने वाली सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव और कोशिकाओं को होने वाली क्षति शामिल हैं, क्या हार्मोन के प्रति संवेदनशील ऊतकों और महिलाओं के प्रजनन तंत्र को प्रभावित करने वाली स्थितियों में योगदान दे सकते हैं।
गर्भाशय की अंदरूनी परत में विकसित होने वाले एंडोमेट्रियल कैंसर का संबंध मोटापा, लंबे समय तक एस्ट्रोजन के संपर्क में रहना, मधुमेह, बढ़ती उम्र और कुछ आनुवंशिक स्थितियों जैसे स्थापित जोखिम कारकों से है। वहीं, अंडाशय के कैंसर के जोखिम कारक अलग हैं, जिनमें उम्र, परिवार में इस बीमारी का इतिहास और विरासत में मिले आनुवंशिक बदलाव शामिल हैं।
दिल्ली-एनसीआर में यह मुद्दा अधिक प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि यहां महिलाएं कई वर्षों तक बार-बार पीएम2.5 के ऊंचे स्तर के संपर्क में आ सकती हैं। सूक्ष्म कणों का संबंध सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव और शरीर पर पड़ने वाले अन्य व्यापक प्रभावों से पाया गया है। इस कारण वैज्ञानिक यह जांच कर रहे हैं कि क्या ये जैविक प्रक्रियाएं फेफड़ों के अलावा हार्मोन के प्रति संवेदनशील अंगों को भी प्रभावित कर सकती हैं।
नयी दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में चिकित्सा कैंसर विज्ञान विभाग के उपाध्यक्ष डॉ. आदित्य सरीन ने कहा कि सामने आ रहे शोध साक्ष्यों के आधार पर वायु प्रदूषण को कैंसर के जोखिम को प्रभावित करने वाले संभावित कारकों में से एक मानने का उचित आधार है।
उन्होंने कहा, 'पीएम2.5 के लंबे समय तक संपर्क में रहने से सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव और कोशिकाओं में बदलाव हो सकते हैं। ये सभी प्रक्रियाएं कैंसर के विकास से जुड़ी हैं। प्रजनन स्वास्थ्य के साथ प्रदूषण के संभावित संबंध के उभरते साक्ष्यों को देखते हुए यह जांच करना महत्वपूर्ण है कि क्या लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से महिलाओं के प्रजनन अंगों में होने वाले कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।।'
सरीन ने कहा, 'हालांकि, अभी कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं हुआ है, लेकिन सामने आए संकेत महत्वपूर्ण हैं और उन पर आगे शोध किए जाने की जरूरत है, खासकर दिल्ली-एनसीआर जैसे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में।'
भाषा रंजन पवनेश
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