नयी दिल्ली, नौ अक्टूबर (भाषा) इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने स्वीकार किया कि महात्मा गांधी द्वारा ‘राम राज्य’ वाक्यांश का इस्तेमाल मुसलमानों को ‘असहज’ कर सकता था, हालांकि उन्होंने गांधी के ‘अंतरधार्मिक’ आचरण और ‘बहुलतावादी’ दृष्टिकोण का दृढ़ता से समर्थन किया।
गुहा ने बृहस्पतिवार को महात्मा गांधी पर अपनी तीसरी पुस्तक ‘आर्ग्युमेंट्स विद गांधी’ के विमोचन के अवसर पर कहा कि गांधी ने ‘राम राज्य’ का इस्तेमाल रूपक के तौर पर किया होगा, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस वाक्यांश की ‘हिंदू व्याख्या’ की जा सकती है।
गुहा ने कहा, “उनका आचरण हमेशा अंतरधार्मिक रहा...लेकिन उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया एक वाक्यांश, जिसकी हिंदू दृष्टिकोण से व्याख्या की जा सकती थी, वह ‘राम राज्य’ था। मेरा मतलब है कि 1930 और 1940 के दशक में कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने निश्चित रूप से इसे इसी रूप में देखा था।”
गांधी पर दो खंडों में जीवनी लिख चुके गुहा ने कहा, “इसलिए, संभव है कि यह वाक्यांश मुसलमानों को असहज करने वाला लगा हो। हालांकि, उनका आचरण पूरी तरह बहुलतावादी था।”
गांधी के अंतरधार्मिक आचरण को रेखांकित करने के लिए गुहा ने उनकी खुले मैदान में होने वाली प्रार्थना सभाओं का उल्लेख किया, जिनमें कुरान का पाठ भी शामिल होता था। उन्होंने कहा कि गांधी अपनी प्रार्थनाओं और भजनों में विभिन्न धर्मों के संदर्भों को शामिल करने का भी प्रयास करते थे।
उन्होंने यह भी कहा कि गांधी मंदिरों में बहुत कम जाते थे, हालांकि, 1946 में मदुरै के मीनाक्षी मंदिर जाना इसका एक उल्लेखनीय अपवाद था, जब पहली बार दलितों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
गुहा ने यह भी बताया कि गांधी कई बार अयोध्या गए, लेकिन उस स्थल पर कभी नहीं गए, जिसे भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता है।
गुहा ने कहा, “गांधी ने टॉल्स्टॉय से जो सीखा था, उसके अनुसार राम उनके हृदय में थे। उन्हें किसी प्रतीक चिह्न की जरूरत नहीं थी और न ही किसी भव्य उत्सव की।”
उन्होंने गांधी की व्यक्तिगत आस्था और सार्वजनिक रूप से धर्म के प्रतीकात्मक प्रदर्शन के बीच अंतर स्पष्ट किया।
गुहा ने विभाजन के बाद अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए गांधी के प्रयासों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय गांधी “भारत में रह रहे मुसलमानों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले अकेले व्यक्ति थे।”
गुहा (68) ने अपनी पुस्तक ‘आर्ग्युमेंट्स विद गांधी’ में जाति के मुद्दे पर बी आर आंबेडकर, धर्म के सवाल पर वी डी सावरकर, अर्थव्यवस्था को लेकर जवाहरलाल नेहरू और अहिंसा के विषय पर भगत सिंह के साथ गांधी के मतभेदों का विश्लेषण किया है। पुस्तक में मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला जैसी हस्तियों पर गांधी के प्रभाव का भी उल्लेख है।
गांधी और आंबेडकर के बीच बहस पर चर्चा करते हुए गुहा ने कहा कि समकालीन राजनीतिक विमर्श में अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान में गांधी के योगदान को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।
उन्होंने कहा, “आज निश्चित रूप से आंबेडकर ही शोषितों और दलितों के सही मायने में मसीहा हैं। लेकिन 1930 के दशक में कांग्रेस के भीतर गांधी ही एकमात्र सवर्ण हिंदू थे, जिन्होंने अस्पृश्यता उन्मूलन की बात की थी।”
उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने उस तरह इस मुद्दे को नहीं उठाया था।
गुहा ने यह भी याद दिलाया कि अस्पृश्यता के खिलाफ गांधी के अभियान के कारण हिंदू रूढ़िवादियों में उनके प्रति विरोध पैदा हुआ था। उन्होंने 1934 में पुणे में हिंदू महासभा के सदस्यों द्वारा गांधी की हत्या के प्रयास का उल्लेख किया।
विद्वान डी आर नागराज की पुस्तक ‘द फ्लेमिंग फीट’ का हवाला देते हुए गुहा ने गांधी के दृष्टिकोण को ‘आत्मशुद्धि की राजनीति’ बताया। इसके तहत सवर्ण हिंदुओं से जातिगत पूर्वाग्रहों को त्यागने का आह्वान किया गया था। उन्होंने कहा कि वहीं, आंबेडकर का दृष्टिकोण ‘आत्मसम्मान की राजनीति’ पर आधारित था, जिसका केंद्र दलितों की मुक्ति थी।
गुहा ने कहा कि नागराज का तर्क था कि मतभेदों के बावजूद गांधी और आंबेडकर के विचारों को एक-दूसरे के विरोधी के बजाय पूरक के रूप में देखा जा सकता है।
उन्होंने कहा, “और हमें उन्हें एक-दूसरे का पूरक मानना सीखना चाहिए। डी आर नागराज के यह पुस्तक लिखने के 33 साल बाद हम इस बात को स्वीकार कर पाए हैं।”
इस संदर्भ में उन्होंने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ संस्थापक अभिजीत दीपके का उदाहरण दिया, जो आंबेडकरवादी महार समुदाय से आते हैं। गुहा के अनुसार, दीपके इस बात को समझते हैं कि “आंबेडकर और गांधी को साथ लाना जरूरी है।”
गुहा ने कहा कि अस्पृश्यता के अन्याय को चुनौती देने के मामले में गांधी ने कांग्रेस के किसी भी अन्य नेता से अधिक योगदान दिया। उन्होंने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के सवाल पर भी गांधी की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि 20वीं सदी में किसी भी अन्य राजनीतिक नेता की तुलना में गांधी ने अपने राजनीतिक आंदोलन में अधिक महिलाओं को शामिल किया।
गुहा ने कहा, “लेनिन से अधिक, माओ से अधिक, चर्चिल से अधिक, रूजवेल्ट से अधिक, डी गॉल से अधिक और हो ची मिन्ह से अधिक।”
अपनी बात के समर्थन में गुहा ने 1925 में गांधी द्वारा सरोजिनी नायडू को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित कराने के लिए चलाए गए अभियान का उल्लेख किया। उस समय ब्रिटेन और अमेरिका में महिलाओं को स्थानीय निकायों का सदस्य तक नहीं चुना जाता था।
गुहा द्वारा पहले लिखी गई गांधी की दो खंडों वाली जीवनी में ‘गांधी बिफोर इंडिया’ और ‘गांधी : द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड’ शामिल हैं।
हार्पर कॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित ‘आर्ग्युमेंट्स विद गांधी’ फिलहाल ऑनलाइन और दुकानों पर ऑफलाइन बिक्री के लिए उपलब्ध है।
भाषा अमित पवनेश
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