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बिहार में मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार हो रहा है : एनएचआरसी

पटना, 10 अक्टूबर (भाषा) राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने बृहस्पतिवार को कहा कि बिहार में मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार हो रहा है।

उन्होंने कहा कि पहले राज्य में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले बहुत अधिक होने की आशंका रहती थी, लेकिन अब स्थिति में सुधार हुआ है।

रामासुब्रमण्यन ने पटना में संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि वह एनएचआरसी के अन्य सदस्यों न्यायमूर्ति विद्युत रंजन सारंगी और न्यायमूर्ति विजया भारती सयानी के साथ यहां आए थे।

आयोग ने सात और आठ अक्टूबर को मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों की दो दिवसीय खुली सुनवाई की तथा विभिन्न हितधारकों के साथ बैठकें कीं।

एनएचआरसी की विज्ञप्ति के अनुसार, खुली सुनवाई के दौरान करीब 73 मामलों की सुनवाई की गई, जिनमें से 29 मामलों को सुनवाई के बाद बंद कर दिया गया। बिहार सरकार ने बंद किए गए 20 मामलों में 1.40 करोड़ रुपये के मुआवजे के भुगतान का प्रमाण आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया।

मतदान के अधिकार पर एनएचआरसी अध्यक्ष ने कहा कि भारत में ‘मतदान का अधिकार’ मानवाधिकार नहीं माना जाता है, जबकि संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (यूडीएचआर) और अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार प्रसंविदा (आईसीसीपीआर) में इसे मान्यता दी गई है। उन्होंने कहा कि देश में इस मुद्दे पर बहस जारी है।

रामासुब्रमण्यन ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘‘एक समस्या है। उच्चतम न्यायालय ने 1954 से कहा है कि मतदान का अधिकार वैधानिक अधिकार है। लेकिन इस पर बहस जारी है।

रामासुब्रमण्यन ने कहा, ‘‘अगर मतदान का अधिकार मानवाधिकार है तो यह सभी लोगों को उपलब्ध होना चाहिए। अगर यह वैधानिक अधिकार है तो यह सीमित रूप में लोगों को उपलब्ध होगा। वे सीमित संख्या के लोग कौन हैं? 18 वर्ष से अधिक आयु के लोग और किसी क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति। ये प्रतिबंध हैं। जब किसी अधिकार को कानून के जरिये सीमित कर दिया जाता है और वह सभी लोगों को सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध नहीं होता, तो सवाल उठता है कि क्या वह मानवाधिकार है। यहीं कठिनाई सामने आती है।’’

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश रामासुब्रमण्यन की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत कथित तौर पर बड़ी संख्या में लोगों को मताधिकार से वंचित किए जाने के खिलाफ दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में व्यापक आंदोलन चल रहा है।

यह मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। शीर्ष अदालत ने इससे पहले बिहार से शुरू किए गए एसआईआर को रोकने से इनकार कर दिया था। बिहार में यह प्रक्रिया नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुई थी। इसके बाद इसके दूसरे चरण में करीब एक दर्जन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया। फिलहाल इस अभियान का तीसरा चरण 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है।

गौरतलब है कि 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा यूडीएचआर को अपनाए जाने के दौरान भारत ने इसके पक्ष में मतदान किया था। यूडीएचआर के सिद्धांतों का भारतीय संविधान के भाग-III पर भी गहरा प्रभाव पड़ा, जिसमें मौलिक अधिकारों का उल्लेख है।

निजी क्षेत्र, जिसमें कंपनियां और बड़े कारोबारी समूह शामिल हैं, में मानवाधिकार के उल्लंघन की स्थिति के बारे में पूछे जाने पर रामासुब्रमण्यन ने कहा कि ऐसे उल्लंघन ‘‘बहुत ज्यादा’’ हैं।

रामासुब्रमण्यन ने निजी क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को भी गंभीर बताया। उन्होंने 2023 के कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले का उल्लेख करते हुए ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि संविधान पीठ ने माना है कि कुछ अधिकार केवल राज्य के खिलाफ लागू होते हैं, जिसे मानवाधिकारों का ऊर्ध्वाधर (वर्टिकल) प्रवर्तन कहा जाता है।

वहीं जब गैर-सरकारी पक्षों द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जाता है तो मानवाधिकारों को क्षैतिज रूप से लागू किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया भर में बड़ी कंपनियां अधिक मानवाधिकार का उल्लंघन करती हैं, इसलिए वहां भी इन अधिकारों को क्षैतिज रूप से लागू किया जा सकता है।

भाषा कैलाश

संतोष

संतोष