नयी दिल्ली, आठ अक्टूबर (भाषा) सरकार ने सभी गैर-अधिसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापारिक लाभ को अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30 प्रतिशत पर सीमित करने का निर्णय लिया है, जिसके दायरे में ब्रांडेड और जेनेरिक, घरेलू और आयातित, तथा पेटेंट और गैर-पेटेंट वाली सभी दवाएं शामिल होंगी। सरकारी सूत्रों ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी।
सूत्रों ने बताया कि इस कदम का उद्देश्य दवाओं पर अत्यधिक व्यापारिक मुनाफे पर अंकुश लगाना है, ताकि इन जीवनरक्षक औषधियों की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए इन्हें लोगों के लिए और अधिक किफायती बनाया जा सके।
इस महीने के अंत में लागू होने वाले इस फैसले से 110 कैंसर-रोधी दवाओं की कीमतों में कमी आएगी, जिनमें पेटेंट वाली 35 दवाएं भी शामिल हैं।
सूत्रों ने कहा, ‘‘इस कदम का मुख्य उद्देश्य गलत तरीके से दवाएं बेचने की प्रथाओं पर लगाम लगाना है। आम तौर पर अधिक लाभ वाली दवाएं बेचने का चलन है, और चूंकि कैंसर-रोधी दवाएं बाकी दवाओं की तुलना में महंगी होती हैं, इसलिए हम उन पर व्यापारिक लाभ की सीमा तय करना चाहते थे।’’
उन्होंने कहा कि इस कदम से कैंसर के मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होगी।
उच्चतम न्यायालय ने 29 सितंबर को कैंसर-रोधी दवाओं की अत्यधिक कीमतों के मुद्दे पर चिंता जताई थी।
सभी दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत व्यापारिक लाभ की पैरवी करते हुए, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा था, ‘‘यह तो लूट है, बिल्कुल साफ-साफ। कैंसर की दवा खुदरा विक्रेता को 2,700 रुपये में दी जाती है, फिर भी उसका एमआरपी 27,000 रुपये है।’’
हालांकि, सरकारी सूत्रों ने कहा कि दवाओं के लाभ को सीमित करने का फ़ैसला संबंधित मामले से जुड़ा नहीं है, बल्कि इस पर 2019 से काम किया जा रहा है।
सूत्रों ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग ने दवाओं की सूची को अंतिम रूप देने के लिए एक समिति बनाई है। उन्होंने यह भी कहा कि दूसरी दवाओं की कीमत तय करने के मामले में सोच-समझकर कदम उठाने की आवश्यकता है।
भाषा नेत्रपाल सुरेश
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