लखनऊ, आठ अक्टूबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय, उसकी लखनऊ पीठ और अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों के वादकारियों से ‘मध्यस्थता फॉर द नेशन 3.0’ अभियान के तहत अपने विवादों का मध्यस्थता के जरिये समाधान करने की अपील की गई है। मध्यस्थता के रजिस्ट्रार भागीरथ वर्मा ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी।
यह अभियान एक अक्टूबर से शुरू हुआ है और 31 दिसंबर तक चलेगा। इसके तहत पक्षकारों को लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी से बचते हुए आपसी सहमति से विवादों का समाधान करने का अवसर दिया जा रहा है। वर्मा ने कहा कि वादकारी मध्यस्थता का विकल्प चुनकर आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की संभावना तलाश सकते हैं।
अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों के पक्षकार संबंधित जिले के दीवानी अदालत परिसर में संचालित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क कर सकते हैं। प्रयागराज स्थित इलाहाबाद उच्च न्यायालय या उसकी लखनऊ पीठ में लंबित मामलों के पक्षकार प्रयागराज स्थित हाई कोर्ट विधिक सेवा समिति या लखनऊ स्थित उसकी उपसमिति से संपर्क कर सकते हैं।
वादकारी अपने अधिवक्ताओं से भी अपने मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजे जाने की संभावना तलाशने का अनुरोध कर सकते हैं। उपयुक्त मामलों में अदालत भी विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज सकती है। वर्मा ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि मामला मध्यस्थता के लिए भेजे जाने के बाद एक निष्पक्ष मध्यस्थ पक्षकारों के बीच बातचीत कराने और आपसी सहमति से समाधान तलाशने में उनकी सहायता करता है। मध्यस्थ विवाद का फैसला नहीं करता और न ही पक्षकारों पर कोई समाधान थोपता है।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता का संचालन प्रशिक्षित और पैनल में शामिल मध्यस्थों द्वारा किया जाता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र में ऐसे अनुभवी अधिवक्ता भी मध्यस्थ हैं, जिन्होंने मध्यस्थता में विशेष प्रशिक्षण लिया है। मध्यस्थता अधिनियम, 2023 के तहत संबंधित मध्यस्थता केंद्र निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपने पैनल में शामिल मध्यस्थों में से एक की नियुक्ति करता है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 255 और उसकी लखनऊ पीठ में 68 प्रशिक्षित मध्यस्थ हैं। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में करीब 1,700 प्रशिक्षित मध्यस्थ काम कर रहे हैं।
अभियान में मध्यस्थता के लिए उपयुक्त माने गए 15 श्रेणियों के विवाद शामिल हैं। इनमें वैवाहिक एवं पारिवारिक विवाद, मोटर दुर्घटना दावा मामले, चेक बाउंस के मामले, समझौता योग्य आपराधिक मामले, उपभोक्ता विवाद, ऋण वसूली एवं सरफेसी से जुड़े मामले, डिक्री के निष्पादन संबंधी मामले, मध्यस्थता संबंधी विवाद, वाणिज्यिक विवाद, सेवा संबंधी मामले, बंटवारे के मामले, बेदखली के मामले, भूमि अधिग्रहण और श्रम विवाद शामिल हैं।
इसके अलावा ऐसे अन्य दीवानी मामलों को भी इसमें शामिल किया गया है, जिनमें कानूनी रूप से समझौता संभव है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ की मध्यस्थता समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति राजन रॉय ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि मध्यस्थता वादकारियों को अपने विवाद के परिणाम पर अधिक नियंत्रण देती है।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक न्यायिक प्रक्रिया में अदालत पक्षकारों को सुनने के बाद उनके अधिकारों का निर्धारण करती है, जबकि मध्यस्थता में पक्षकार एक निष्पक्ष मध्यस्थ की सहायता से समझौते की शर्तों पर बातचीत कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति रॉय ने कहा कि मध्यस्थता से वादकारियों को काफी समय, खर्च और तनाव बचाने में मदद मिलती है तथा अदालतों पर लंबित मामलों का बोझ भी कम होता है। उन्होंने कहा कि आपसी सहमति से हुआ समझौता संबंधों को बनाए रखने और विवाद से जुड़े अन्य मामलों को भी समाप्त करने में मदद कर सकता है।
उच्चतम न्यायालय की पहल पर शुरू किए गए इस अभियान से उत्तर प्रदेश में पहले ही काफी अच्छे परिणाम मिले हैं।
भाषा जफर रंजन
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