बैंकॉक, आठ अक्टूबर (भाषा) दक्षिण एशियाई देश भीषण गर्मी से निपटने के लिए नीतियों और योजनाओं को मजबूत कर रहे हैं, लेकिन इन्हें जमीनी स्तर पर क्रियान्वित करने संबंधी स्वास्थ्य निगरानी और वित्त पोषण जैसी आवश्यक प्रणालियों की गति अब भी सुस्त है। यह बात एक संयुक्त आकलन रिपोर्ट में कही गई।
बैंकॉक में ‘ग्लोबल हीट फोरम’ में जारी की गई यह रिपोर्ट बताती है कि भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान भीषण गर्मी से बचने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं। इसके साथ ही यह रिपोर्ट इंतजामों में कमियों को भी उजागर करती है।
यह आकलन ‘ग्लोबल हीट हेल्थ इन्फॉर्मेशन नेटवर्क’ के दक्षिण एशिया हब ने किया है। इसे नयी दिल्ली में ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर’ (सीईईडब्ल्यू) ने कई संगठनों के साथ मिलकर आयोजित किया।
इन संगठनों में ‘सस्टेनेबल फ्यूचर्स कोलैबोरेटिव’ (एसएफसी), ‘नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल’ (एनआरडीसी), ‘बीआरएसी जेम्स पी ग्रांट स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ और ‘यूनाइटेड नेशंस इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड द पैसिफिक’ (यूएनईएससीएपी) शामिल हैं। इसके साथ ही इसमें डब्ल्यूएचओ-डब्ल्यूएमओ का ‘क्लाइमेट एंड हेल्थ जॉइंट प्रोग्राम’ भी शामिल रहा।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘चारों देशों में आकलन से वास्तविक गति का पता चलता है।’’
आकलन रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित क्षेत्र में गर्मी कार्ययोजना, मौसम का पूर्वानुमान और समय रहते चेतावनी देने जैसे तरीकों से योजना एवं नीति बनाने के मामले में तेज़ी से सुधार हो रहा है, लेकिन इन चीज़ों को जमीनी स्तर पर कार्रवाई और सुरक्षा में बदलने वाली प्रणाली को अभी और बेहतर होने की जरूरत है।
इसमें कहा गया है कि भले ही कुछ देश बड़े पैमाने पर इस अंतर को कम करने लगे हैं, फिर भी कोशिशें एक जैसी नहीं हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने प्रतिक्रियाशील राहत से आगे बढ़कर जोखिम को पहले से कम करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, लेकिन अगला कदम आपदा प्रबंधन से आगे बढ़कर गर्मी से निपटने की योजना का दायरा बढ़ाना है। इसके लिए समर्पित कोष सुनिश्चित करना और हर योजना में स्वास्थ्य परिणामों को शामिल करना आवश्यक है।
भाषा नेत्रपाल नरेश
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