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करीब 760 साल पुरानी अरबी पांडुलिपि 'इजाह-उल-मआनी 'अला अल-तलखीस' अब तक पहचानी गई सबसे पुरानी

(श्रुति भारद्वाज)

नयी दिल्ली, चार सितंबर (भाषा) करीब 760 साल पुरानी अरबी पांडुलिपि 'इजाह-उल-मआनी 'अला अल-तलखीस' अब तक पहचानी गई सबसे पुरानी पांडुलिपि है जबकि उर्दू में लिखी गई 'कथा राधेश्याम' की पांडुलिपि भी उन अन्य असामान्य ग्रंथों में शामिल है, जिन्हें ज्ञान भारतम मिशन के तहत दिल्ली की अनुमानित 88,000 पांडुलिपियों की विरासत के दस्तावेजीकरण के दौरान दर्ज किया जा रहा है।

जमिया हमदर्द विश्वविद्यालय के लाइब्रेरियन अख्तर परवेज ने बताया कि 1266 ईस्वी (687 हिजरी) की यह पांडुलिपि अरबी में अर्थ, अभिव्यक्ति, वक्तृत्व और भाषण-कौशल के अध्ययन से जुड़े “इल्म-ए-मआनी” और “बलाग़त” विषयों पर आधारित है।

उन्होंने कहा कि इसमें विचारों को उचित, प्रभावी और प्रभावशाली तरीके से व्यक्त करने के सिद्धांतों पर चर्चा की गई है। इससे विद्वानों को कुरआन के पाठ और अरबी साहित्य समेत शास्त्रीय अरबी ग्रंथों के सूक्ष्म अर्थों और साहित्यिक सुंदरता को समझने में मदद मिल सकती है।

उन्होंने कहा कि इस संग्रह में कई तरह के विषय शामिल हैं, जो इस क्षेत्र की बौद्धिक, धार्मिक, साहित्यिक और वैज्ञानिक परंपराओं को दर्शाते हैं।

परवेज ने कहा कि यह संग्रह भारत की विविध धार्मिक व साहित्यिक परंपराओं को भी दर्शाता है, जिसमें महाभारत, भगवद्गीता और कथा राधेश्याम जैसी रचनाओं की पांडुलिपियां भी हैं।

उन्होंने कहा कि इनमें कथा राधेश्याम विशेष रूप से असामान्य है, क्योंकि यह उर्दू में लिखी गई पांडुलिपि है, इसलिए यह भाषाई, सांस्कृतिक और पांडुलिपि संबंधी अध्ययनों के लिए महत्वपूर्ण है।

लाइब्रेरियन ने कहा कि एक अन्य संभावित रूप से महत्वपूर्ण पांडुलिपि अल-क़ानून फ़ी अल-तिब्ब है, जो यूनानी चिकित्सा से संबंधित है।

परवेज ने कहा कि यह चिकित्सा के इतिहास तथा यूनानी चिकित्सा ज्ञान के विकास और एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी हो सकती है।

विश्वविद्यालय ने कहा कि पांडुलिपियों की पहचान और प्रारंभिक समीक्षा के माध्यम से अभी तक पहले से अज्ञात किसी जानकारी की निर्णायक रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

हालांकि, परवेज के अनुसार, कई पांडुलिपियों में यूनानी चिकित्सा, धर्म, साहित्य, भाषाविज्ञान और सांस्कृतिक इतिहास के क्षेत्र में काफी शोध की संभावनाएं हैं। इसके लिए विद्वानों द्वारा पांडुलिपियों का अध्ययन किया जाना जरूरी है।

भाषा जोहेब रंजन

रंजन