नयी दिल्ली, चार सितंबर (भाषा) शब्द ‘सिक्योरिटी’ (सुरक्षा) भले ही शुरुआती आधुनिक काल में अंग्रेजी भाषा का हिस्सा बना हो, लेकिन शासक वर्ग की सुरक्षा के लिए सबसे कुशल और विशिष्ट बलों को चुनने और तैयार करने की परंपरा मिस्र के फराओ, रोमन और चीनी सम्राटों के समय से चली आ रही है। इस तरह का दावा एक किताब में किया गया है।
भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के पूर्व अधिकारी और आसूचना ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक यशोवर्धन आजाद ने अपनी पहली पुस्तक ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक’ में सुरक्षा खतरों, तकनीक और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के साथ सदियों से व्यक्तिगत सुरक्षा में आए बदलावों का जिक्र किया है।
इसमें रोमन सम्राटों की रक्षा करने वाले 'प्रेटोरियन गार्ड', चीन के 'जिनवेई', ओटोमन साम्राज्य के 'जनिस्सरी' और मुगल शासकों के 'अहदी' से लेकर अमेरिका की 'सीक्रेट सर्विस' और भारत के 'एसपीजी' (विशेष सुरक्षा समूह) का विस्तृत ब्योरा दिया गया है।
आजाद लिखते हैं कि ‘सिक्योरिटी’ शब्द 16वीं शताब्दी में अंग्रेजी भाषा में शामिल हुआ, जो लैटिन शब्द ‘सेक्युरस’ से निकला है, जिसका अर्थ है ‘चिंता से मुक्ति’।
प्राचीन मिस्र के फेरोह अपनी सुरक्षा का जिम्मा सैन्य कुलीन वर्ग के सुरक्षाकर्मियों को सौंपते थे। वहीं रोमन सम्राटों की सुरक्षा 'प्रेटोरियन गार्ड' और बीजान्टिन सम्राटों की रक्षा 'वरंगियन गार्ड' जैसे विशिष्ट दस्ते करते थे।
चीन के शाही रक्षकों को 'जिनवेई' कहा जाता था, जबकि भारत में मुगल शासकों के अंगरक्षक 'अहदी' कहलाते थे, जिन्हें विशिष्ट घुड़सवार टुकड़ियों में से चुना जाता था।
आजाद ने अमेरिका में राष्ट्रपति की सुरक्षा के विकासक्रम को भी रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा कि जब 1865 में अब्राहम लिंकन और 1901 में राष्ट्रपति विलियम मैकिनाले की हत्या हुई, तब राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए कोई एक समर्पित एजेंसी नहीं थी। इसके अगले साल 'सीक्रेट सर्विस' ने राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट की सुरक्षा का जिम्मा संभाला।
लेखक के अनुसार बाद में 1917 के संसदीय कानून के तहत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपतियों और राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों की सुरक्षा में इसके कार्यों व भूमिका को तय किया गया।
आजाद बताते हैं कि भारत में विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) का गठन 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद हुआ था। सुरक्षा चूकों की जांच और सिफारिशें देने के लिए उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. पी. ठक्कर के नेतृत्व में एक सदस्यीय आयोग बनाया गया था, जिसके बाद 1985 में एसपीजी का गठन हुआ।
किताब में लिखा है कि आयोग की मुख्य सिफारिश प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए एक अलग विशेष एजेंसी बनाने की थी। बाद में 1988 के एसपीजी अधिनियम ने एसपीजी के कामकाज के दायरे को तय किया और प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था को ‘युक्तिसंगत और वैज्ञानिक’ तरीके से व्यवस्थित करने में अहम भूमिका निभाई।
आजाद का कहना है कि सुरक्षा प्रणालियों के विकास, उन्नत तकनीक, विशेष प्रशिक्षण, सख्त प्रोटोकॉल और आधुनिक खुफिया तंत्र के बावजूद खामियां अब भी बरकरार हैं।
उन्होंने लिखा कि पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम सुरक्षा को एक जरूरत मानते थे, ‘‘न कि प्रतिष्ठा का प्रतीक’’, वहीं कई भारतीय राजनेताओं के लिए सुरक्षा घेरा ‘वीआईपी संस्कृति का प्रतीक’, उनके अहंकार और उनके प्रभाव व कद को दर्शाने का जरिया बन गया है।
ब्लूम्सबरी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक’ का विमोचन शुक्रवार को होना है।
भाषा वैभव पवनेश
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