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बूथ स्तरीय एजेंट एसआईआर में केवल सत्यापन योग्य जानकारी के लिए जिम्मेदार : दिल्ली उच्च न्यायालय

नयी दिल्ली, तीन सितंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को फैसला सुनाया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान सत्यापित न हो सकने वाले गणना-प्रपत्रों में गलत विवरण के लिए राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के एजेंट (बीएलए) को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

न्यायमूर्ति अमित बंसल ने कहा कि बीएलए केवल ऐसी जानकारी के लिए जिम्मेदार हैं, जिसका वे सत्यापन कर सकते हैं, जैसे मतदाता की तस्वीर।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस अदालत की राय में, बीएलए को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के तहत केवल ऐसी जानकारी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिसका वह सत्यापन कर सकता है, जैसे- मतगणना प्रपत्र पर लगी तस्वीर मतदाता की पहचान से मेल खाती है या नहीं।’’

अधिनियम की धारा 31 के तहत मतदाता सूची तैयार करने, उसके पुनरीक्षण या उसमें सुधार के संबंध में गलत घोषणा करना दंडनीय अपराध है। इसके लिए एक साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।

न्यायमूर्ति बंसल ने यह फैसला दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी (डीपीसीसी) के अध्यक्ष देवेंद्र यादव और डीपीसीसी की बूथ प्रबंधन समिति के अध्यक्ष राजेश कुमार गर्ग की याचिका पर सुनाया।

याचिकाकर्ताओं ने राजनीतिक दलों के बूथ स्तरीय एजेंट के लिए व्यक्तिगत रूप से यह घोषणा करना अनिवार्य किए जाने को चुनौती दी थी कि उन्होंने मतगणना प्रपत्र में दर्ज सभी जानकारियों का खुद सत्यापन किया है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि न तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और न ही निर्वाचक पंजीकरण नियमों में ऐसा कोई प्रावधान है, जो निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से इस तरह की घोषणा लेने का अधिकार देता हो।

यह दलील दी गयी कि चूंकि गणना-प्रपत्र में भरी जाने वाली जानकारी सिर्फ मतदाता को ही पता होती है और बीएलए का काम सिर्फ मदद करना है, इसलिए उनसे ऐसी सभी जानकारियों को व्यक्तिगत रूप से प्रमाणित करने के लिए नहीं कहा जा सकता।

निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया कि उसने सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों को एसआईआर प्रक्रिया में भाग लेने के लिए अपने बीएलए नियुक्त करने की अनुमति दी थी, ताकि यह धारणा दूर हो सके कि बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) ने किसी खास पार्टी के समर्थकों को जानबूझकर और पक्षपातपूर्ण तरीके से छोड़ दिया है।

आयोग ने कहा कि मतदाताओं की ओर से आवेदन और गणना-प्रपत्र जमा करते समय बीएलए से वचन-पत्र लेना आयोग के स्थायी निर्देशों और 'मतदाता सूची नियमावली, 2023' का हिस्सा था।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि एसआईआर तंत्र के तहत, सत्यापन और ‘शपथपत्र’ की ज़िम्मेदारी बीएलओ की थी, और इसलिए गणना-प्रपत्र में दी गई जानकारियों की सटीकता को प्रमाणित करने के लिए बीएलए से व्यक्तिगत शपथपत्र लेने का कोई औचित्य नहीं था।

अदालत ने यह भी कहा कि हालांकि मृत या दूसरी जगह चले गए मतदाताओं के प्रपत्र के लिए बीएलए की पूरी जिम्मेदारी होगी, क्योंकि वे खुद जुटाई गई जानकारी के आधार पर उन्हें भरते हैं, लेकिन अन्य मतदाताओं से जुड़ी ऐसी जानकारियों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जिनकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

भाषा सुरेश माधव

माधव