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त्रिवेणी संगम पर गंगा बनती है अनोखी सूक्ष्मजीव प्रयोगशाला : पुस्तक में दावा

नयी दिल्ली, 29 अगस्त (भाषा) उत्तर प्रदेश के प्रयागराज का त्रिवेणी संगम केवल आध्यात्मिक महत्व वाला स्थान ही नहीं है, बल्कि यहां विषाणुओं और जीवाणुओं के बीच होने वाली अनोखी परस्पर क्रिया गंगा को एक असाधारण सूक्ष्मजीव प्रयोगशाला बनाती है। एक नयी किताब में यह दावा किया गया है।

पद्मश्री से सम्मानित और प्रयागराज के स्वतंत्र शोध वैज्ञानिक अजय कुमार सोनकर ने अपनी किताब ‘‘द रिवर दैट रिमेम्बर्स: माइक्रोबियल इंटेलिजेंस ऑफ नेचर’’ में सूक्ष्म जीव विज्ञान, विषाणु विज्ञान और सांस्कृतिक स्मृति को जोड़ते हुए गंगा नदी का अध्ययन किया है।

लेखक का कहना है कि संगम में श्रद्धालुओं द्वारा लगाई जाने वाली हर डुबकी एक गहन सूक्ष्मजीवी आदान-प्रदान की प्रक्रिया बन जाती है, जिसका असर गंगा के पानी में दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि कुंभ मेले जैसे आयोजनों के दौरान विषाणु-जीवाणु की यह परस्पर क्रिया और तेज हो जाती है। स्नान की रस्मों के बाद इन विषाणुओं की संख्या और विविधता अपने चरम पर पहुंच जाती है।

डॉ सोनकर ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत के दौरान अपने पुस्तक के हवाले से बताया, ‘‘गंगा के पानी में पाया जाने वाला ‘बैक्टेरियोफेज’ की मुलाकात, इसमें अलग-अलग जलवायु से आये श्रद्धालुओं के शरीर के सूक्ष्मजीवियों से होती रहती है। यह बैक्टेरियोफेज तत्काल उन सूक्ष्मजीवियों की प्रतिक्रियास्वरूप उनसे निपटने के लिए अपने बैक्टेरियोफेज का विकसित स्वरूप तैयार करती है और उससे होने वाले संभावित नुकसान को रोक देती है। गंगा के इस गुण की वजह से गंगा का पानी सालों साल खराब नहीं होता।’’

उन्होंने कहा कि यह बैक्टेरियोफेज गंगा के पानी में इस वजह से सबसे अधिक प्रभावी है, क्योंकि विश्व की अन्य प्रसिद्ध नदियों के मुकाबले आस्था के रूप में लाखों करोड़ों लोग न सिर्फ गंगा की पूजा करते हैं, बल्कि पूजा पद्धति का एक अहम पहलू यह है कि श्रद्धालु सशरीर गंगा में डुबकी लगाते हैं। इस प्रक्रिया में अलग-अलग जलवायु क्षेत्र में पाये जाने वाले सूक्ष्मजीवी गंगा में जमा हो जाते हैं और गंगा के पानी को संतुलित रखने के लिए बैक्टेरियोफेज अपने स्परूप को अद्यतन करते रहते हैं।

पिछले वर्ष आयोजित महाकुंभ को दुनिया का सबसे बड़ा जनसमागम बताया गया था। पैंतालीस दिनों के दौरान देश-विदेश से 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालु त्रिवेणी संगम के तट पर पहुंचे थे।

सोनकर ने किताब में लिखा है, ‘‘देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां आते हैं और अपने साथ अलग-अलग तरह के सूक्ष्मजीव, जीवाणु, विषाणु और कवक लाते हैं, जो उनके अपने वातावरण के अनुकूल विकसित हुए हैं।’’

उन्होंने कहा कि इन लोगों के शरीर और त्वचा पर मौजूद सूक्ष्मजीव तटीय इलाकों, हिमालयी क्षेत्रों, रेगिस्तानों, शहरी केंद्रों और भारत के उष्णकटिबंधीय आंतरिक हिस्सों के वातावरण के अनुसार अलग-अलग होते हैं।

सोनकर के अनुसार, गंगा के पानी में हमारी मानव सभ्यता के विकासक्रम का पूरा रिकॉर्ड जमा है, जिसमें सूक्ष्मजीवियों और उसके बदलते स्वरूप की पूरी जानकारी उपलब्ध है।

भाषा राजेश शफीक राजेश सुरेश

सुरेश