तिरुवनंतपुरम, 29 अगस्त (भाषा) भाजपा की केरलम इकाई के अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने शनिवार को कहा कि राज्य की महिलाओं को संविधान के तहत सीखने, उत्सव मनाने और स्वतंत्रता एवं सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है। उन्होंने महिलाओं पर धर्मगुरुओं के फरमान थोपने की किसी भी कोशिश का विरोध किया।
चंद्रशेखर ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि भाजपा और राजग महिलाओं को फिर से ‘‘मध्ययुगीन पर्दा प्रथा’’ में धकेलने के किसी भी प्रयास को अनुमति नहीं देंगे।
चंद्रशेखर का बयान ऐसे समय आया है, जब शुक्रवार को राज्य के इस्लामी विद्वानों के प्रमुख संगठन ने धार्मिक आयोजनों के आयोजकों से महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर नहीं लाने या उन्हें ऐसे पुरुषों के बीच नहीं बैठाने की अपील की थी, जिनसे उनका कोई पारिवारिक संबंध नहीं है।
हालांकि, चंद्रशेखर ने किसी विशेष घटना या धर्म का उल्लेख नहीं किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखने की सोच अतीत का हिस्सा है और ‘विकसित भारत’ तथा भारतीय लोकतंत्र में उसका कोई स्थान नहीं है।
चंद्रशेखर ने कहा, ‘‘केरलम की हर युवती और महिला को संविधान के तहत बिना धर्मगुरुओं के फरमान या राजनीतिक समझौते के पूरी स्वतंत्रता और सम्मान के साथ सीखने, उत्सव मनाने, नेतृत्व करने, सपने देखने और जीवन जीने का अधिकार है।’’
भाजपा नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत महिलाओं के सशक्तीकरण से आगे बढ़कर महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाएं सशस्त्र बलों, अंतरिक्ष अभियानों, कंपनियों के शीर्ष पदों और स्टार्टअप के क्षेत्र में देश को आगे ले जा रही हैं।
माकपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा ने शनिवार को इस फरमान को ‘‘महिलाओं के खिलाफ’’ बताया।
फेसबुक पोस्ट में शैलजा ने कहा कि आज केरलम में मुस्लिम महिलाएं काफी पढ़ी-लिखी हैं और उन्होंने विधायक, नगरपालिका अध्यक्ष, पंचायत अध्यक्ष और अन्य चुने हुए प्रतिनिधियों के तौर पर अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है।
उन्होंने बताया कि मुस्लिम महिलाएं न्यायाधीश, वकील, डॉक्टर, शिक्षक और श्रमिक के तौर पर भी काम करती हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘महिलाओं का सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा होना, बैठकों में एक ही मंच साझा करना या साथ बैठकर खाना खाने में कोई धार्मिक उल्लंघन नहीं है।’’
माकपा की एक और वरिष्ठ नेता पी.के. श्रीमति ने महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर न लाने की अपील की कड़ी निंदा की और इसे तुरंत वापस लेने की मांग की।
हालांकि, सुन्नी युवजन संगम (एसवाईएस) के नेता मुस्तफा मुंडुपारा और नसर फैजी कूडाथायी समेत इस्लामी विद्वानों ने शनिवार को इस निर्देश का समर्थन किया।
मुंडुपारा ने फेसबुक पर एक पोस्ट में कहा कि मुस्लिम महिलाओं और धार्मिक आस्था रखने वाले समुदाय से उनकी मूल धार्मिक मान्यताओं से जुड़े मामलों में सतर्क रहने की अपील करने वालों की आलोचना करने का कोई कारण नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘‘इस्लाम में धर्म का पालन करने वाले मुस्लिम के जीवन के लिए कुछ नियम और अनुशासन निर्धारित किए गए हैं।’’
मुंडुपारा ने कहा कि इस्लामी विद्वान और संगठन के नेतृत्व समय-समय पर समुदाय को ऐसे मामलों के बारे में याद दिलाते रहते हैं।
हालांकि, सत्तारूढ़ संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के प्रमुख घटक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने खुद को इस विवाद से अलग रखने की कोशिश की।
संवाददाताओं द्वारा पार्टी की प्रतिक्रिया पूछे जाने पर आईयूएमएल के प्रदेश महासचिव पी. एम. ए. सलाम ने मलप्पुरम में कहा, ‘‘विद्वानों द्वारा व्यक्त किए गए विचार पर पार्टी की कोई विशेष राय नहीं है। पार्टी न तो इसे खारिज करने जा रही है और न ही इसका समर्थन करेगी। धार्मिक संगठनों के अपने विचार हो सकते हैं, जबकि आईयूएमएल का अपना राजनीतिक रुख है।’’
भाषा शफीक दिलीप
दिलीप