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सोनिया गांधी नीत एनएसी शासन पर ‘दिमागी नक्सल’ के कब्जे का प्रमुख उदाहरण थी: ‘ऑर्गनाइजर’ पत्रिका

नयी दिल्ली, 28 अगस्त (भाषा) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर देश के नाम संबोधन में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘दिमागी नक्सल’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसस) से जुड़ी एक पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ के संपादकीय में कांग्रेस को निशाना बनाया गया है।

संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील सरकार (संप्रग) सरकार में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) शासन व्यवस्था पर ‘दिमागी नक्सल’ के कब्जे का एक प्रमुख उदाहरण थी।

‘ऑर्गनाइजर’ पत्रिका के नवीनतम अंक में प्रकाशित संपादकीय में माओवादी दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि ‘दिमागी नक्सल’ वे लोग हैं, जो शहरों में गुप्त रूप से काम करते हैं और छात्रों, महिलाओं, मजदूर वर्ग, किसानों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और ‘तथाकथित अल्पसंख्यकों’ के नाम पर कई मुखौटा संगठन बनाते हैं।

इसमें कहा गया है कि जहां उन्हें अपने मंच के जरिए ‘फ्रैक्शनल काम’ करने की जगह नहीं मिलती, वहां वे दूसरे संगठनों में घुसपैठ करते हैं और “सर्वाधिक गुप्त तरीकों” से उनके एजेंडे को प्रभावित करते हैं।

पत्रिका के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने ‘डिकोडिंग एंड डीफिटिंग द दिमागी नक्सल्स’ शीर्षक वाले अपने लेख में कहा, ‘‘संप्रग सरकार के कार्यकाल के दौरान सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन संप्रग सरकार में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद, शासन व्यवस्था पर दिमागी नक्सलियों के कब्जे का एक प्रमुख उदाहरण थी।’’

उन्होंने कहा कि नौकरशाही, नीति-निर्माण तंत्र, कानूनी व्यवस्था, अकादमिक जगत, मीडिया और गैर सरकारी संगठनों में ‘घुसपैठ’ करने का विचार उनकी ‘क्रांतिकारी रणनीति’ का हिस्सा है।

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘वे बंदूकें नहीं उठाते, बल्कि प्रख्यात इतिहासकार या बुद्धिजीवी, पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार, कानून के दिग्गज, मानवाधिकार कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार, चर्चित अभिनेता या अभिनेत्री और पर्यावरणविद् जैसे तमगे इस्तेमाल करते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ उनका प्रतिरोध का साधन नागरिक समाज है।’’

पंद्रह अगस्त को 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने देश को ‘दिमागी नक्सल’ के बारे में चेताया था।

उन्होंने आरोप लगाया था कि ये लोग व्यवस्था में अपनी जड़ें जमा चुके हैं और नीतियों में हेरफेर करके समाज के लिए खतरा बने हुए हैं। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से उन्हें ‘पहचानने और अलग-थलग करने’ का आह्वान किया था।

केतकर ने कहा, ‘‘जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी ने ‘दिमागी नक्सल’ का इस्तेमाल किया, कुछ लोग घबरा गए और इस शब्द को बुद्धिजीवी-विरोधी बताकर सवाल उठाने लगे। लेकिन कुछ जाने-माने लोगों ने ‘दिमागी नक्सल पार्टी’ के रूप में प्रतिरोध का एक और तरीका अपनाकर इसे गर्व का प्रतीक बना लिया।” यह टिप्पणी वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के स्पष्ट संदर्भ में की गई थी।

प्रधानमंत्री के संबोधन के एक दिन बाद चिदंबरम ने मोदी की ‘दिमागी नक्सल’ वाली टिप्पणी पर निशाना साधते हुए ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा था, ‘‘मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।’’

केतकर ने कहा कि ‘दिमागी नक्सल’ से उत्पन्न खतरों को समझना और उन्हें पहचानने तथा बेनकाब करने के लिए संबंधित एजेंसियों और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर काम करना “हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य” है।

उन्होंने कहा, ‘‘उन ‘दिमागी नक्सल’ की पहचान करें, उनकी असलियत समझें और उन्हें बेनकाब करें, जो लोगों की भावनाओं और उनकी वास्तविक चिंताओं का फायदा उठाकर उन्हें गुमराह करना चाहते हैं। वे वास्तविक बदलाव लाने वाले नहीं हो सकते, बल्कि हिंसक अधिनायकवाद के खतरनाक एजेंट हैं, जहां लोकतांत्रिक भागीदारी के बिना सड़कों पर और विरोध के जरिए फैसले लिए जाएंगे।”

केतकर ने कहा, ‘‘चूंकि सशस्त्र विद्रोह बुरी तरह विफल हो चुका है, इसलिए अब ‘दिमागी’ स्वरूप ने उसकी जगह ले ली है।”

भाषा संतोष दिलीप

दिलीप

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