(फाइल फोटो के साथ जारी)
नयी दिल्ली, 28 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि राज्य, पीड़ित या शिकायतकर्ता की ओर से अपील दायर नहीं किए जाने की स्थिति में कोई अपीलीय अदालत किसी दोषी की सजा अपनी ओर से नहीं बढ़ा सकती।
शीर्ष अदालत ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सनसनीखेज तिहरे हत्याकांड से जुड़े एक मामले में की जिसमें कालीकट विश्वविद्यालय के एक पूर्व कुलपति, उनकी पत्नी और उनके सुरक्षा गार्ड की हत्या कर दी गई थी।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मामले के सह-दोषी गोपी की उम्रकैद की सजा को बढ़ाकर शेष जीवन के लिए कारावास में बदल दिया गया था।
उम्रकैद या आजीवन कारावास का अर्थ दोषी के शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास होता है लेकिन सजा में छूट के जरिए इसकी अवधि कम की जा सकती है जबकि ‘‘शेष जीवन के लिए कारावास’’ में समय से पहले रिहाई या सजा में किसी तरह की कमी की गुंजाइश नहीं होती। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 433ए के अनुसार उम्रकैद की सजा काट रहे किसी दोषी को 14 साल जेल में रहने के बाद ही ऐसी छूट दी जा सकती है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पूर्व कुलपति मलिक मोहम्मद के चालक के रूप में काम करने वाले अंबरासु को धोखाधड़ी की एक गतिविधि में लिप्त पाए जाने के बाद नौकरी से निकाल दिया गया था।
अंबरासु और उसके सहयोगी गोपी ने बदला लेने के इरादे से मोहम्मद के चौकीदार ज्ञानप्रकाशम की हत्या की और फिर वे दोनों उनके घर में घुस गए।
दोनों ने मोहम्मद की भी हत्या कर दी और उनकी पत्नी खतीजा बीबी को उनकी ही कार में अपने साथ ले गए।
अंबरासु और गोपी, बीबी को तमिलनाडु के विलुप्पुरम जिले के ओंगूर गांव ले गए और उन पर पेट्रोल एवं डीजल का मिश्रण डालकर आग लगा दी जिससे उनकी मौत हो गई। पुलिस को 14 नवंबर 2007 को उनका आंशिक रूप से जला हुआ शव मिला था।
अधीनस्थ अदालत ने अंबरासु को मौत की सजा और गोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने गोपी की उम्रकैद की सजा को बढ़ाकर शेष जीवन के लिए कारावास में बदल दिया।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सजा को लेकर राज्य, शिकायतकर्ता या पीड़ित की ओर से कोई अपील दायर नहीं किए जाने के बावजूद उच्च न्यायालय ने गोपी की सजा बढ़ाने के लिए स्वत: संज्ञान लेते हुए पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र का गलत इस्तेमाल किया।
पीठ ने कहा कि यह स्थापित सिद्धांत है कि यदि राज्य, पीड़ित या शिकायतकर्ता ने सजा को लेकर कोई अपील नहीं की है, तो अपीलीय अदालत अपनी ओर से दोषी की सजा बढ़ाकर उसे अपील दायर करने से पहले की तुलना में अधिक प्रतिकूल स्थिति में नहीं डाल सकती।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय ने सजाओं को एक के बाद एक चलाने का निर्देश देकर गलती की। पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए हम निर्देश देते हैं कि सजाएं साथ-साथ चलेंगी।’’
भाषा
सिम्मी माधव
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