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कारागारों में बंद भाइयों को राखी बांधकर बहनों ने उनकी रिहाई की कामना कीं

रायपुर/ सुलतानपुर, 28 अगस्त (भाषा) छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित केंद्रीय जेल में शुक्रवार सुबह सैकड़ों बहनें राखी और मिठाई लेकर जेल में बंद अपने भाइयों से मुलाकात का इंतजार करती देखी गईं।

कुछ बहनें सूरज उगने से पहले ही जेल के सामने पहुंच गई थीं और अपने बच्चों के साथ लंबी कतारों में खड़ी थीं। वह अपने बच्चों को लंबे समय के बाद मामा से मिलवाने के लिए उत्सुक थीं।

बाद में जेल प्रहरियों ने राखी लेकर आई हुई बहनों के आधार कार्ड को जांचा और टोकन जारी किया। इसके बाद महिलाओं को कतार में अंदर जाने, अपने भाइयों को राखी बांधने और वापस आने की इजाजत दी गई।

बाहर इंतजार कर रहे लोगों के लिए यह मौका जेल में आम मुलाकातों से कहीं अधिक खास था।

जे. पद्मा, जिनका छोटा भाई पिछले कुछ महीनों से जेल में बंद हैं, ने बताया कि वह सुबह पांच बजे से ही कतार में खड़ी थी। उन्होंने कहा, ‘‘नियमों के मुताबिक, जेल परिसर में तीन बहनें जा सकती हैं, या एक बहन तीन राखी और 100 ग्राम मिठाई ले जा सकती है। हम सुबह पांच बजे से कतार में खड़े हैं। मैं खुश हूं, लेकिन दुखी भी हूं।’’

भारती यादव ने बताया, ‘‘इंतजाम अच्छे हैं। मैं पहले भी अपने भाई को राखी बांधने यहां आ चुकी हूं। हमें बहुत खुशी होती है क्योंकि हम उनसे मिल पाते हैं और राखी बांध पाते हैं। यह त्योहार साल में सिर्फ एक बार आता है।’’

दुर्ग जिले से आई एक और महिला, डेरहिन ने बताया कि वह सुबह छह बजे से कतार में खड़ी थीं।

उन्होंने ‘पीटीआई वीडियो’ को बताया, ‘‘मुझे देर हो रही थी, इसलिए मैंने जेल के एक कर्मचारी से कहा कि राखी ले लें और मुझे जाने दें। लेकिन उन्होंने मुझसे रुकने और खुद राखी बांधने के लिए कहा।’’

रायपुर केंद्रीय जेल के अधीक्षक योगेश सिंह क्षत्री ने बताया कि हर साल इस त्योहार के लिए उत्साह दिखता है, क्योंकि आमतौर पर चार से पांच हजार लोग आते हैं।

उन्होंने कहा कि सुबह के समय भीड़ अधिक होती है क्योंकि लोग एक साथ आते हैं, जबकि दोपहर तक भीड़ धीरे-धीरे कम हो जाती है।

क्षत्री ने बताया कि रक्षाबंधन पर सिर्फ बहनों को ही कैदियों से मिलने की इजाजत होती है और वे राखियां और मिठाइयां साथ ले जा सकती हैं। बाकी चीजें दूसरे दिनों में होने वाली आम मुलाकातों के दौरान दी जा सकती हैं।

छत्तीसगढ़ की केंद्रीय और जिला जेलों में भी बहनों को राखियों और मिठाइयों के साथ इंतजार करते हुए देखा गया।

कांकेर के भानुप्रतापपुर इलाके के चौगेल (मुल्ला) गांव में एक पुनर्वास केंद्र में, आत्मसमर्पण करने वाली महिला माओवादियों ने सुरक्षाबलों, जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के जवानों को राखियां बांधीं।

पुनर्वास और कौशल प्रशिक्षण ले रही महिलाओं ने त्योहार से पहले खुद एक हजार से अधिक राखियां बनाई थीं।

समर्पण करने वाली माओवादी शांति कोवाची के लिए यह पहला रक्षाबंधन का त्योहार था। कौशल विकास प्रशिक्षण के जरिए उन्होंने राखियां बनाना सीखा और शुक्रवार को हाथ से बनी राखियों में से एक डीआरजी जवान को बांधी।

उन्होंने कहा कि यह पल खास और भावुक था। उन्होंने कहा कि समर्पण करने और पुनर्वास से गुजरने के बाद, अब उन्हें लग रहा है कि वे सच में मुख्यधारा के समाज में लौट रही हैं।

डीआरजी आरक्षक टेकेश्वर हिचामी ने कहा, ‘‘एक समय था जब हालात ने दोनों पक्षों को बंदूकें लेकर एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया था। आज, वही हाथ राखी के पवित्र धागे से जुड़े हैं। यह एक अलग और भावुक अनुभव है।’’

इसी तरह का माहौल सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिला कारागार में भी देखने को मिला। रक्षाबंधन पर बड़ी संख्या में बहनें अपने बंदी भाइयों को राखी बांधने कारागार पहुंचीं।

भेटौरा निवासी नीतू ने बताया कि वह भाई के लिए राखी और मिठाई लेकर आई हैं और ईश्वर से जल्द रिहाई की प्रार्थना की। दोस्तपुर से आईं रूपा ने भी कहा कि भाई को इस हाल में देखकर दुख होता है।

मिश्रौली की ललिता ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि जेल में आकर भाई को राखी बांधनी पड़ेगी। एक अन्य महिला ने कहा कि वे भाइयों की लंबी उम्र और सलामती की दुआ करने आई हैं, ताकि वे जल्द छूटकर सही रास्ते पर आ सकें।

सुलतानपुर के जेल अधीक्षक प्रांजल अरविंद ने बताया कि रक्षाबंधन पर 307 पुरुष बंदियों को राखी बांधने के लिए 478 महिलाएं और 103 बच्चे आए थे।

भाषा संजीव धीरज

धीरज