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आपदा के लिए सिर्फ जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं : वैज्ञानिक

देहरादून, 27 अगस्त (भाषा) वैज्ञानिकों का कहना है कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में बढ़ती बाढ़, भूस्खलन, हिमनदों के पिघलने और अत्यधिक बारिश की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि हिमालय जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों की ओर बढ़ रहा है। साथ ही आगाह किया है कि हर हिमालयी आपदा के लिए केवल जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराना वास्तविक समस्या से ध्यान भटकाने जैसा है।

दून विश्वविद्यालय परिसर में स्थित डॉ नित्यानंद हिमालयी शोध एवं अध्ययन संस्थान में भूविज्ञान विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक वाई पी सुंद्रियाल, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार में आधारभूत एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के डॉ. एसपी सती तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक नवीन जुयाल द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है कि हिंदू-कुश हिमालय में ग्रीष्म मानसून के दौरान चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।

अनुसंधान के मुताबिक यहां तक कि अपेक्षाकृत शुष्क और पश्चिमी विक्षोभ से प्रभावित उत्तर-पश्चिमी हिमालय में भी 2010 के बाद विनाशकारी बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमनदों के तेजी से पिघलने, अस्थिर हिमनद झीलों की बढ़ती संख्या और बारिश के बदलते पैटर्न ने खतरा बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि तापमान बढ़ने के कारण ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी की जगह अधिक बारिश होने की स्थिति बन रही है, जिससे ढलानों पर जमा मलबे के अस्थिर होने और भूस्खलन तथा मलबा के खिसकने का खतरा बढ़ रहा है।

अनुसंधानकर्ताओं ने इस संबंध में 2013 की केदारनाथ आपदा (उत्तराखंड), 2014 में ग्या झील आपदा (लद्दाख), 2021 की ऋषिगंगा बाढ़ (उत्तराखंड), 2023 में दक्षिण ल्होनक झील के फटने (सिक्किम) तथा 2025 में ब्यास नदी (हिमाचल प्रदेश), धराली और थराली (उत्तराखंड) तथा किश्तवाड़ (जम्मू-कश्मीर) में हुई आपदाओं का उल्लेख करते हुए हिमालय की नाजुकता को रेखांकित किया है।

अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण बात सामने आयी है कि अधिकांश विनाशकारी बाढ़ें मुख्य नदियों से नहीं, बल्कि छोटे हिमनदों या बरसाती जलधाराओं से पैदा हुईं। ये जलधाराएं पानी के साथ भारी मात्रा में चट्टानें, बोल्डर और मलबा लेकर आती हैं और संकरी घाटियों में बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, ‘‘आपदा तभी आती है जब खतरा और संवेदनशीलता एक-दूसरे से मिलते हैं।’’ उन्होंने कहा कि बढ़ती आबादी और व्यावसायिक गतिविधियों के कारण लोग और बुनियादी ढांचा अब अस्थिर ढलानों और नदी के बाढ़ क्षेत्र के करीब पहुंच रहे हैं।

अनुसंधानकर्ताओं ने उत्तराखंड के बाढ़ मैदान क्षेत्रीकरण अधिनियम- 2012 का भी जिक्र किया है, जिसके तहत नदी के मध्य बिंदु से 100 मीटर के दायरे में निर्माण पर रोक का प्रावधान है। उनका कहना है कि कानून होने के बावजूद उसका प्रभावी क्रियान्वयन जमीन पर नहीं हो पा रहा है।

वैज्ञानिकों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है और हिमालय पर इसका असर गंभीर हो सकता है, लेकिन हर आपदा के बाद केवल जलवायु परिवर्तन को दोष देने के बजाय जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान, निर्माण पर प्रभावी नियंत्रण और मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करना जरूरी है।

अध्ययन का संदेश साफ है, हिमालय को बचाने के लिए अब प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पहले से तैयारी और जोखिम कम करने की नीति अपनानी होगी ।

भाषा दीप्ति

धीरज

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