पिथौरागढ़, 24 अगस्त (भाषा) उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में सूर घाटी के कुमौर गांव में सोमवार को ऐतिहासिक 'हिलजात्रा' मुखौटा महोत्सव मनाया गया जहां हज़ारों दर्शकों की मौजूदगी में इसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी संबोधित किया।
पिछले 500 वर्षों से अधिक समय से मनाए जा रहे इस पर्व को ‘डिजिटल’ माध्यम से संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने इसे पिथौरागढ़ की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बताया और कहा कि यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रदेश की आस्था, विश्वास, लोक परंपराओं और ग्रामीण जीवन की समृद्ध विरासत का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि हिलजात्रा जैसे पर्व हमारी सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम हैं ।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, पूर्वजों की परंपराओं और लोक संस्कृति से जोड़ने का काम करता है जहां भगवान शिव के गण लखिया भूत का आगमन सुख, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
धामी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उत्तराखंड विकास के साथ अपनी विरासत और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार देवभूमि उत्तराखंड को विश्व की आध्यात्मिक राजधानी के रूप में स्थापित करने के संकल्प के साथ कार्य कर रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि केदारखंड की तर्ज पर मानसखंड क्षेत्र के पौराणिक मंदिरों के पुनरुत्थान, संरक्षण और सौंदर्यीकरण के कार्य, हरिद्वार-ऋषिकेश गंगा गलियारा, हरिपुर यमुना गलियारा, गोल्ज्यू गलियारा, विवेकानंद गलियारा और शारदा गलियारा जैसी परियोजनाओं के माध्यम से राज्य की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को नया स्वरूप दिया जा रहा है।
इस अवसर पर उन्होंने पिथौरागढ़ के जाखनी गांव में स्थित बाबा गंगनाथ मंदिर के सौंदर्यीकरण की भी घोषणा की ।
'आठों' उत्सव के हिस्से के तौर पर भगवान गौरा और महेश्वर की पूजा के लिए मनाया जाने वाला यह त्योहार 'लखिया भूत' के जागृत होने के लिए मशहूर है, जिन्हें भगवान शिव के गण वीरभद्र के रूप में पूजा जाता है । माना जाता है कि दक्ष की बेटी और भगवान शिव की पत्नी सती ने अपने पिता द्वारा हरिद्वार के कनखल में आयोजित यज्ञ में अपने पति को न बुलाए जाने से नाराज होकर खुद को जिंदा जला लिया था जिसके बाद वीरभद्र ने उस यज्ञ को नष्ट कर दिया था और दक्ष प्रजापति का सिर काट दिया था ।
कुनौर गांव में इस त्योहार के आयोजक यशवंत सिंह महर ने कहा, ‘‘हिलजात्रा सूर घाटी का धान की रोपाई की परंपरा से जुड़ा एक त्योहार है और इसमें सड़कों पर धान की रोपाई के समय की स्थितियों और गतिविधियों को दिखाया जाता है।’’
हिलजात्रा डुंगरी, रावलगांव, बजेती, सतगढ़, मजीरकंडा और कई अन्य गांवों में भी मनाया जाता है, लेकिन लखिया भूत को जागृत करने की परंपरा केवल कुनौर गांव में ही निभाई जाती है।
महर ने कहा,‘‘ हम लखिया को गांव और फसलों के रक्षक के रूप में पूजते हैं।’’
त्योहार में मुखौटा पहने कलाकार मैदान में कई किरदार निभाते हैं, जैसे सफाई करने वाला, धान की रोपाई करती महिलाएं, रोपाई देखने आई एक बुजुर्ग महिला, धान की रोपाई के लिए खेत जोतते बैलों के तीन जोड़े, एक आलसी बैल, हिरणों और चित्तीदार हिरणों का झुंड तथा हुक्का पीता हुआ एक बुजुर्ग व्यक्ति।
महर ने कहा कि 'हिलजात्रा' नेपाल की काठमांडू घाटी के मुखौटा-आधारित सड़क उत्सव 'इंद्रजात्रा' से प्रभावित है ।
माना जाता है कि जब यहां के 'महार' भाइयों ने काठमांडू के राजा के सामने अपनी बहादुरी और बुद्धिमानी का प्रदर्शन किया, तो राजा ने यह उत्सव उनके पूर्वजों को भेंट में दिया था ।
भाषा सं दीप्ति राजकुमार
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