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उच्च न्यायालय ने पत्नी की गैर इरादतन हत्या के दोषी व्यक्ति को बरी किया

प्रयागराज, 21 अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि परिजनों की मौजूदगी में दर्ज किए गए मरणासन्न व्यक्ति के बयान पर सुरक्षित तौर पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अदालत ने पत्नी की झुलसने से हुई मृत्यु के संबंध में गैर इरादतन हत्या के दोषी पति को बरी कर दिया।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने मुरादाबाद के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के निर्णय के खिलाफ जगन नाम के व्यक्ति की अपील स्वीकार कर ली। अधीनस्थ अदालत ने उसे आईपीसी की धारा 304 के तहत दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

आरोपों के मुताबिक, अपीलकर्ता ने 23 दिसंबर, 2025 को अपनी पत्नी त्रिवेणी पर केरोसिन तेल डालकर उसे आग लगा दी थी। त्रिवेणी को मुरादाबाद के सरकारी अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों के यह प्रमाणित करने के बाद कि वह बयान देने के लिए फिट है, मरणासन्न स्थिति में उसका बयान दर्ज किया गया।

अपने बयान में त्रिवेणी ने कहा था कि उसके पति ने उस पर केरोसिन तेल डालकर आग लगा दी थी।

हालांकि, अदालत ने उन परिस्थितियों पर गौर किया, जिनसे मृत्युपूर्व बयान की विश्वसनीयता संदिग्ध नजर आई। अदालत ने पाया कि त्रिवेणी के भाई ने जिरह के दौरान स्पष्ट रूप से बताया था कि मजिस्ट्रेट ने सभी परिजनों की मौजूदगी में पीड़िता का बयान दर्ज किया था।

पीठ ने 17 जुलाई के अपने निर्णय में कहा, ‘‘मरने से पहले दिए गए बयान को परिवार के सभी सदस्यों की मौजूदगी में दर्ज कराया गया था, इसलिए इसे कोई महत्व नहीं दिया जा सकता।’’

अदालत ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता पति अपनी पत्नी की जान बचाने का प्रयास करते समय स्वयं झुलस गया था।

अदालत ने कहा, ‘‘इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि पति ने अपनी पत्नी को बचाने की कोशिश की थी और इस दौरान वह खुद भी झुलस गया था। बचाव पक्ष द्वारा जिरह में एक डॉक्टर ने भी यह कहा कि अपीलकर्ता को जो जख्म हुआ वह एक जलते हुए व्यक्ति को बचाने के प्रयास में होता है।’’

बचाव पक्ष के एक गवाह ने भी यह प्रमाणित किया कि त्रिवेणी को अपीलकर्ता की मां द्वारा अस्पताल ले जाया गया था। अपीलकर्ता और महिला 18 वर्षों से विवाहित थे और उनकी कोई संतान नहीं थी।

अदालत ने कहा कि साक्ष्य से संकेत मिलता है दंपति के बीच विवाद इस बात को लेकर था कि बच्चा किस पक्ष से गोद लिया जाए। त्रिवेणी का परिवार ननिहाल से जबकि अपीलकर्ता का पक्ष ददिहाल से बच्चा गोद लिए जाने के पक्ष में था।

पीठ ने कहा कि चूंकि शादी के 18 साल बीत चुके थे, इसलिए किसी भी तरह से यह नहीं माना जा सकता कि शिकायतकर्ता पक्ष से किसी तरह के दहेज की मांग थी।

अदालत ने इस बात का परीक्षण किया कि क्या त्रिवेणी ने खुद अपने को आग लगाई थी या फिर यह कृत्य आरोपी ने किया था।

अदालत ने कहा, ‘‘यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने केरोसिन तेल डालकर अपनी पत्नी को आग लगाई थी। इस प्रकार से हमारा विचार है कि निश्चित तौर पर पति को इस घटना के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।’’

भाषा सं राजेंद्र आशीष

आशीष