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आईडी अधिनियम के लंबित मामलों पर ‘उद्योग’ शब्द की पुरानी व्याख्या लागू होती रहेगी : न्यायालय

नयी दिल्ली, 21 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक अहम फैसले में कहा है कि अब निरस्त किए जा चुके औद्योगिक विवाद (आईडी) अधिनियम, 1947 के तहत उसने “उद्योग” शब्द की जो व्यापक और कर्मचारी हितैषी व्याख्या 48 साल पहले की थी, वह अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और सरकारी विभागों से जुड़े हजारों लंबित मामलों पर लागू होती रहेगी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा है कि ‘उद्योग’ शब्द की उसकी व्याख्या 2020 की औद्योगिक संबंध (आईआर) संहिता के तहत नये मामलों पर लागू नहीं होगी।

शीर्ष अदालत ने 489 पन्नों के पांच अलग-अलग फैसलों में 1978 के ऐतिहासिक बेंगलुरु जल आपूर्ति मामले के फैसले को पलटने और “उद्योग” शब्द की परिभाषा को सीमित करने से इनकार कर दिया है।

उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर शुक्रवार को अपलोड किए गए फैसले में कहा गया है कि करीब 50 साल पहले तैयार किया गया “ट्रिपल टेस्ट” औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत “उद्योग” की परिभाषा तय करने का सही पैमाना बना हुआ है और यह सुनिश्चित करता है कि लंबित मामलों पर इस अधिनियम के तहत मिलने वाला संरक्षण जारी रहेगा।

हालांकि, नौ-सदस्यीय संविधान पीठ में शामिल न्यायाधीशों की कुछ मुद्दों पर अलग-अलग राय थी। पीठ ने 6:3 के बहुमत वाले फैसले में माना है कि “उद्योग” की परिभाषा पर सात-सदस्यीय संविधान पीठ के 1978 के फैसले पर पुनर्विचार के अनुरोध वाला संदर्भ सही तरीके से भेजा गया था।

प्रधान न्यायाधीश ने न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति आलोक आराधे और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की ओर से 154 पन्नों का फैसला सुनाते हुए कहा, “वर्तमान संदर्भ वैध तरीके से भेजा गया है और इसे सही ढंग से स्वीकार किया गया है। इसकी स्वीकार्यता पर कोई वाजिब संदेह नहीं जताया जा सकता है और इसलिए इस संदर्भ का जवाब इसके गुण-दोष के आधार पर दिया गया है।”

न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने संदर्भ के सुनवाई योग्य होने समेत कई मुद्दों पर इन न्यायाधीशों के विचारों से सहमति जताई।

हालांकि, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने संदर्भ के सुनवाई योग्य होने के मुद्दे पर बहुमत के फैसले से अलग राय रखी।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस मामले पर असहमति जताते हुए कहा, “मेरी राय में मेरे तर्कों को देखते हुए नौ न्यायाधीशों की पीठ को संदर्भ भेजे जाने की जरूरत नहीं थी। दूसरी बात, वर्तमान समय में इस संदर्भ का जवाब देना जरूरी नहीं है। इसके अलावा, बेंगलुरु जल आपूर्ति मामले में इस अदालत के फैसले के गहन विश्लेषण के बाद मेरा मानना है कि उस पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है।”

हालांकि, न्यायमूर्ति बागची ने अपने अलग फैसले में इस मुद्दे पर प्रधान न्यायाधीशों के विचारों से सहमति जताई और न्यायमूर्ति नागरत्ना से असहमति व्यक्त की। उन्होंने कहा, “यह संदर्भ वैध तरीके से भेजा गया था।”

न्यायमूर्ति दत्ता ने भी अपने और न्यायमूर्ति भुइयां की ओर से अलग फैसला लिखा। उन्होंने संदर्भ के मुद्दे पर प्रधान न्यायाधीश और पांच अन्य न्यायाधीशों से असहमति जताई, जबकि न्यायमूर्ति नागरत्ना के विचारों से सहमति व्यक्त की।

न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा, “स्पष्ट रूप से कहा जाए तो ... भेजा गया संदर्भ आवश्यक नहीं था और इससे कोई व्यावहारिक, न्यायिक या सैद्धांतिक उद्देश्य पूरा नहीं होता। यह संदर्भ लगभग आधी सदी से कायम स्थिति को बदलने का प्रयास करता है।”

सभी न्यायाधीश इस बात पर सहमत थे कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत “उद्योग” शब्द की परिभाषा पर पुनर्विचार करने से परहेज किया जाए।

भाषा पारुल सुरेश

सुरेश