जोधपुर, 16 अगस्त (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने रविवार को राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (एनएलयू) से महज प्रौद्योगिकी में बदलाव पर प्रतिक्रिया देने के बजाय इस बात को तय करने में अग्रणी भूमिका निभाने का आह्वान किया कि न्याय, निष्पक्षता और मानवीय विवेक को केंद्र में रखते हुए प्रौद्योगिकी को किस तरह कानूनी व्यवस्था को नया रूप देना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, जोधपुर में आयोजित ‘कुलपतियों के सम्मेलन 2.0’ को संबोधित करते हुए कहा कि विधि पेशा अब प्रौद्योगिकी को देर से अपनाने वाला नहीं रह सकता। उन्होंने विधि शिक्षा में जेनरेटिव एआई जैसे उपकरणों के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध को भी खारिज किया।
जेनरेटिव एआई एक प्रकार की कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली है जो लिखित निर्देशों के आधार पर स्वचालित रूप से सामग्री उत्पन्न करती है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “शैक्षणिक ईमानदारी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार इस्तेमाल को पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनना चाहिए। इस तरह का बदलाव संस्थानों की सुविधा के अनुसार नहीं चलता।”
सम्मेलन का विषय “कानूनी प्रौद्योगिकी और इसका रोडमैप : कानूनी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विधि को अग्रणी के रूप में स्थापित करना” था।
सीजेआई ने कहा कि प्रौद्योगिकी पहले ही कानूनी परिवेशी तंत्र को बदल रही है। उन्होंने कहा कि इसमें अनुबंध तैयार करने और कानूनी मामलों की समुचित पड़ताल से लेकर विधि शोध, साक्ष्य प्रबंधन तथा विवाद समाधान तक शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि विधि महाविद्यालयों को इस बदलाव पर प्रतिक्रिया देने वाली पहली कतार में होना होगा। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि आने वाले समय में विधि स्नातक ऐसे उपकरणों के साथ काम करेंगे, जो कुछ ही सेकंड में हजारों न्यायिक नजीरों को पढ़ने, कानूनी और नियामकीय जोखिमों की पहचान करने तथा अदालतों और विवाद समाधान तंत्र की मदद करने में सक्षम होंगे।
हालांकि, उन्होंने कहा कि केवल प्रौद्योगिकी से परिचित होना पर्याप्त नहीं होगा।
उन्होंने कहा, ‘‘जो स्नातक केवल किसी तकनीकी उपकरण से मिले नतीजे को समझता है, वह उस पर निर्भर रहेगा, जबकि धारणाओं पर सवाल उठाने, निष्कर्षों की पुष्टि करने और स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए प्रशिक्षित व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी छोड़े बिना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर सकेगा।’’
सीजेआई ने विधि शिक्षा में जेनरेटिव एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के इस्तेमाल को लेकर बढ़ती बहस का भी जिक्र किया। उन्होंने माना कि इस बात को लेकर जायज चिंताएं हैं कि छात्र एआई पर निर्भर हो सकते हैं, स्वतंत्र रूप से तर्क देने की क्षमता खो सकते हैं या विश्वसनीय दिखने वाले लेकिन गलत जवाबों को सही मान सकते हैं। हालांकि, उन्होंने ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात को खारिज किया।
उन्होंने कक्षाओं में इनके पारदर्शी और निगरानी में इस्तेमाल की वकालत की, ताकि छात्र उनकी क्षमताओं और सीमाओं दोनों को समझ सकें।
सीजेआई ने कहा कि अपरिहार्य तकनीकी बदलाव का विरोध करने वाले संस्थान उसे दिशा देने का अवसर खोने का जोखिम उठाते हैं। उन्होंने कहा कि विधि शिक्षा को केवल बदलाव के अनुरूप ढलने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, क्योंकि अनुकूलन का मतलब बदलाव होने के बाद उस पर प्रतिक्रिया देना है।
सीजेआई ने कहा, “इसके बजाय, विधि विश्वविद्यालयों को तकनीकी विकास का पूर्वानुमान लगाना चाहिए, उसकी दिशा तय करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रौद्योगिकी कानून तथा उसके मूल्यों की सेवा में विकसित हो।”
उन्होंने इसके लिए राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग पर जोर दिया और एल्गोरिदम की जवाबदेही, डेटा संरक्षण, न्याय तक डिजिटल पहुंच तथा प्रौद्योगिकी और विवाद समाधान के बीच बदलते संबंधों पर गंभीर शोध का आह्वान किया।
भाषा अमित प्रशांत
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