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उमर ने जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा और राज्य का दर्जा बहाल करने की पैरवी की

श्रीनगर, 15 अगस्त (भाषा) जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शनिवार को कहा कि अगर 2019 में परिस्थितियां नहीं बदली होतीं, तो पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के लोग “हमारे साथ जुड़ने” की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे होते।

उमर अब्दुल्ला ने राज्य का दर्जा और अन्य संवैधानिक गारंटी बहाल करने के लिए अपनी सरकार की प्रतिबद्धता जताई।

अब्दुल्ला ने यहां बख्शी स्टेडियम में स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) के लोगों की स्थिति पर चिंता जताई और कहा कि आजादी के बाद कबायली हमले का मुकाबला करने वाले उनकी पार्टी के पूर्वज सही थे।

अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘मैं लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि हम आपके साथ हैं, हम आपका प्रतिनिधित्व करते रहेंगे और जम्मू-कश्मीर को उस स्तर तक ले जाने के लिए काम करेंगे, जिसकी कल्पना उन लोगों ने की थी जिन्होंने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी और शहादत दी।’’

उन्होंने कहा, “उस बलिदान का सम्मान करने के लिए हम उन सपनों को साकार करेंगे, जो वे अपनी विरासत के रूप में हमारे लिए छोड़ गए हैं-चाहे विशेष दर्जा वापस हासिल करना हो, जम्मू-कश्मीर के लिए संवैधानिक गारंटी बहाल करना हो, राज्य का दर्जा वापस पाना हो या प्रगति के नए दौर की शुरुआत करना हो।”

पीओजेके में हो रहे प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने कहा कि वहां की स्थिति ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक शेख मुहम्मद अब्दुल्ला और उनके सहयोगियों के 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों का मुकाबला करने के फैसले को सही साबित किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब मैं सीमा पार की स्थिति देखता हूं तो मुझे एहसास होता है कि हमारे पूर्वजों का ‘हमलावर खबरदार, हम कश्मीरी हैं तैयार’ कहना सही था।’’

केंद्र ने यदि 2019 में विशेष संवैधानिक गारंटी समाप्त नहीं किया गया होता, तो आज पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर (पीओजेके) के लोग जम्मू-कश्मीर के साथ फिर से जुड़ने के लिए लड़ रहे होते।

उन्होंने कहा, ‘‘आज जब हम नियंत्रण रेखा के पार जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से को देखते हैं तो वहां पीड़ा, दुख और चिंता है। मेरे मन में यह विचार आता है कि शायद अगर 2019 में हमारी परिस्थितियां नहीं बदली होतीं, तो जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से के लोग आज हमारे साथ जुड़ने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे होते।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जम्मू-कश्मीर का वह हिस्सा हमारा है। हम वहां के लोगों को अपना मानते हैं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आज भी उनके लिए सीटें रखी गई हैं, इस उम्मीद के साथ कि एक दिन वे लोग इन खाली सीटों का इस्तेमाल कर सकेंगे।’’

अब्दुल्ला ने लोकतंत्र और संघवाद को भारत की दो सबसे बड़ी ताकत बताया। उन्होंने कहा, ‘‘हर कीमत पर लोकतंत्र की रक्षा करना, हर कीमत पर लोकतंत्र को मजबूत करना और हर कीमत पर लोकतंत्र को बरकरार रखना—यह हमारी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।’’

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत केवल कागज पर ही नहीं, बल्कि भावना से भी राज्यों का संघ है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब हम संघवाद की बात करते हैं तो उसे मजबूत करने की शुरुआत जम्मू-कश्मीर से होती है। हमसे जो कुछ छीना गया है, उसे वापस किया जाना चाहिए, ताकि यह संघवाद और हमारी पहचान केवल शब्दों तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें व्यवहार में भी उतारा जाए।’’

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने अब्दुल्ला के स्वतंत्रता दिवस भाषण की आलोचना करते हुए इसे ‘‘गैर-जिम्मेदाराना’’ बताया और कहा कि यह ‘‘दुर्भाग्यपूर्ण’’ है कि वह भ्रम का माहौल पैदा करना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद ही कश्मीर में संघीय ढांचा मजबूत हुआ है। उन्होंने कहा, “मैं इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण और गैर-जिम्मेदाराना भाषण कहूंगा, क्योंकि यह राजनीतिक मंच नहीं है। इस मंच से देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता की बात होनी चाहिए थी, सैनिकों और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जानी चाहिए थी और खासकर तिरंगे के गौरव और सम्मान की बात होनी चाहिए थी।’’

जम्मू क्षेत्र के पडर-नागसेनी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक शर्मा ने आरोप लगाया कि अब्दुल्ला देश के संघीय ढांचे की मजबूती पर सवाल उठाना चाहते थे।

शर्मा ने ‘पीटीआई-भाषा’ वीडियो से कहा, ‘‘मैं मुख्यमंत्री से कहना चाहता हूं कि पांच अगस्त, 2019 के बाद ही यह संघीय ढांचा मजबूत हुआ है। यही कारण है कि आज हर कश्मीरी ‘वंदे मातरम्’ गुनगुना रहा है।’’

अब्दुल्ला ने अपने संबोधन में कहा कि संघवाद को मजबूत करने का मतलब केवल केंद्रशासित प्रदेश को राज्य में बदलना नहीं, बल्कि राज्यों को मजबूत करना है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब केंद्रीय एजेंसियां राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू करती हैं तो संघवाद प्रभावित होता है। जब किसी राज्य के अधिकारों को कम किया जाता है, खोखला किया जाता है और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा उनका इस्तेमाल किया जाता है, तो संघवाद प्रभावित होता है और इसका नतीजा अक्सर सड़कों पर दिखाई देता है।’’

अब्दुल्ला ने कहा कि दिल्ली में हाल में हुए छात्र प्रदर्शन भी इसी मुद्दे का परिणाम थे।

उन्होंने कहा, ‘‘हमारे संघीय ढांचे के तहत शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों राज्य के विषय थे... लेकिन परीक्षा प्रणाली बदल दी गई। नीट, एनटीए और जेईई जैसी परीक्षाएं शुरू की गईं और राज्यों से मेडिकल एवं इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले देने का अधिकार ले लिया गया। इसका नतीजा दिल्ली में इसी क्रम के खिलाफ हुए प्रदर्शन और आंदोलनों के रूप में सामने आया।’’

मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय संस्थानों के लिए राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं आयोजित करना ठीक है, लेकिन राज्यों को अपने संस्थानों के लिए परीक्षाएं आयोजित करने का अधिकार मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में भी भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली के कारण युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा।

भाषा अमित माधव

माधव