अहमदाबाद, 15 अगस्त (भाषा) भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर ऐतिहासिक शहर अहमदाबाद में स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी विरासत को याद किया जा रहा है, जिसमें शहीदों, क्रांतिकारी महिलाओं और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत प्रतिरोध की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
साल 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में साबरमती आश्रम से निकली प्रसिद्ध दांडी यात्रा से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हुए जोरदार विरोध तक अहमदाबाद ने ब्रिटिश शासन को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान छात्र उमाकांत कड़िया और विनोद किनारीवाला शहीद हुए थे। इस आंदोलन में महिला नेताओं की सक्रिय भागीदारी और भूमिगत गतिविधियों ने भी अहम भूमिका निभाई थी।
स्थानीय इतिहासकार और लेखक मनेल पटेल 'सेतु' ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “जब पूरे देश में अंग्रेजों की गुलामी से आजादी की अलख जग रही थी और आठ अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू करते हुए 'करो या मरो' का आह्वान किया था, तब अहमदाबाद के खड़िया इलाके के लोग विद्रोह के लिए उठ खड़े हुए और सड़कों पर उतर आए।”
उन्होंने कहा कि अहमदाबाद ने ब्रिटिश शासन का जोरदार विरोध किया। इतिहासकार ने बताया कि गुजरात में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआती चिंगारी खड़िया इलाके में ही देखने को मिली थी।
पटेल ने बताया कि नौ अगस्त, 1942 को खड़िया चार रास्ता के प्रवेश मार्ग को लोगों ने बंद कर दिया और पुलिस को रोकने की कोशिश की।
उन्होंने कहा, “भीड़ को हटाने और पत्थरबाजी रोकने के लिए पुलिस ने गोली चला दी। दरियापुर के 21 वर्षीय छात्र उमाकांत कड़िया खड़िया चार रास्ता के पास साइकिल से जा रहे थे। गोलीबारी से बिना डरे उमाकांत पीछे हटने के बजाय आगे बढ़ते रहे और पुलिस की एक गोली उनके माथे पर लगी।”
कड़िया अहमदाबाद के 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के पहले शहीद बने। खड़िया चार रास्ता के पास आज भी उमाकांत मोतीराम कड़िया के बलिदान की याद में एक स्मारक स्तंभ मौजूद है।
उस स्तंभ पर लिखा है, “इसी स्थान पर हिंद छोड़ो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उमाकांत मोतीराम कड़िया को अंग्रेजों की गोली लगी और वह पहले शहीद बने।”
पटेल ने बताया कि इसके अगले दिन, 10 अगस्त, 1942 को करीब 2,000 छात्रों का जुलूस गुजरात कॉलेज परिसर पहुंचा, जहां पुलिस ने लाठीचार्ज और गोलीबारी की।
इतिहासकार के अनुसार, भारतीय ध्वज लेकर चल रहे छात्र विनोद किनारीवाला ने 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाया और आगे बढ़े, तभी एक गोली उनके पेट में लगी और उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
पटेल ने कहा कि उन्होंने एक प्रत्यक्षदर्शी ब्रह्मकुमार भट्ट से मुलाकात की थी, जिन्होंने उन्हें यह घटना बताई थी।
गुजरात कॉलेज परिसर में बना संगमरमर का स्मारक स्तंभ किनारीवाला और उनके बलिदान की याद दिलाता है।
पटेल ने कहा कि अहमदाबाद का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान केवल युवाओं के सड़कों पर उतरने तक सीमित नहीं था। उन्होंने कहा कि महिलाओं ने भी अपने घरों से बाहर निकलकर अहमदाबाद में चंपाबेन मेहता के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रचना सिंह और सौम्या सिंह द्वारा लिखे गए शोध लेख “भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं की अग्रणी भूमिका” के अनुसार, चंपाबेन मेहता, पेरीनाबेन मिस्त्री, सुमित्राबेन ठाकोर और रंजनबेन दलाल जैसी महिलाओं ने जनता के बीच कांग्रेस पत्रिकाएं बांटकर आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण संदेशवाहक की भूमिका निभाई।
लेख में कहा गया है, “महिलाओं ने लेखिका, वक्ता, नर्स और धरना देने वाली कार्यकर्ता जैसी कई भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने सड़क प्रदर्शनों और 'प्रभात फेरियों' का आयोजन किया, राष्ट्रवादी नारे लगाकर लोगों में देशभक्ति की भावना जगाई। उन्होंने अस्पतालों में जाकर घायल स्वतंत्रता सेनानियों की देखभाल भी की।”
इतिहासकार ने बताया कि अहमदाबाद के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय 12 मार्च, 1930 को शुरू हुआ, जब महात्मा गांधी 79 अन्य साथियों के साथ साबरमती आश्रम से ऐतिहासिक दांडी यात्रा पर निकले।
यात्रियों ने वर्तमान नवसारी जिले के दांडी तक पैदल यात्रा की, जहां गांधी ने अंग्रेजों के नमक कानून को तोड़ा।
इस घटना ने इस यात्रा को ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे प्रभावशाली अहिंसक आंदोलनों में से एक बना दिया।
अहमदाबाद के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी डॉ. जयंती ठाकोर ने 1930 में दांडी यात्रा में भाग लेने के बाद दो साल जेल में बिताए। बाद में उन्होंने 1942 में स्वतंत्रता संग्राम की भूमिगत गतिविधियों को संचालित किया।
उनके बेटे समीर ठाकोर ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “1942 में जब महात्मा गांधी समेत सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, तब गांधी ने अहमदाबाद के स्वतंत्रता सेनानी जयंती ठाकोर को आंदोलन की भूमिगत गतिविधियों का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी थी। इसी कारण उन्हें 'शहर सुबा' (शहर के प्रशासक) की उपाधि मिली।”
इतिहासकार पटेल ने कहा कि अहमदाबाद के लिए स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत महात्मा गांधी के जीवन और कार्यों से गहराई से जुड़ी हुई है। गांधी ने शहर में कई वर्ष बिताए और साबरमती नदी के किनारे साबरमती आश्रम की स्थापना की।
अहमदाबाद के कई नेताओं ने महात्मा गांधी के साथ मिलकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया।
पटेल ने कहा, “अहमदाबाद ने स्वतंत्रता संग्राम को बहुत करीब से देखा है और महात्मा गांधी की विरासत को आगे बढ़ाया है।”
भाषा जोहेब माधव
माधव