ब्रसेल्स, 23 जून (एपी) अफगान तालिबान का एक प्रतिनिधिमंडल यूरोपीय संघ (ईयू) के अधिकारियों के साथ निर्वासन के मुद्दे पर वार्ता के लिए मंगलवार को ब्रसेल्स आ रहा है। तालिबान के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।
यूरोपीय संघ के देशों में शरण मांगने वाले प्रवासियों के सबसे बड़े समूहों में अफगान नागरिक शामिल हैं। हालांकि, कई देशों की सरकारें उन अफगान नागरिकों की निर्वासन प्रक्रिया को तेज करने की पक्षधर हैं, जिनके शरण आवेदन खारिज हो चुके हैं या जिन्होंने मेजबान देशों में अपराध किए हैं।
यूरोपीय संघ 27 देशों का समूह है। वर्ष 2021 में अमेरिका-नेतृत्व वाली सेनाओं की वापसी के बाद तालिबान के सत्ता में आने से लेकर अब तक अफगान अधिकारियों ने नागरिक अधिकारों पर कड़े और दमनकारी प्रतिबंध लगाए हैं, जिनका सबसे अधिक असर महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों पर पड़ा है।
मानवाधिकार संगठनों ने कहा है कि यह बैठक यूरोपीय संघ की मानवाधिकार संबंधी प्रतिबद्धताओं को कमजोर करेगी और इससे यूरोप तथा अफगानिस्तान में लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ में शोधकर्ता फेरेश्ता अब्बासी ने कहा, ‘‘तालिबान के साथ किसी भी तरह की बातचीत में मानवाधिकारों की रक्षा और जवाबदेही को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि लोगों को ऐसे स्थान पर निर्वासित किया जाना चाहिए, जहां उन्हें खतरे का सामना करना पड़ सकता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यूरोपीय संघ के देश एक ओर तालिबान द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की निंदा कर रहे हैं और जवाबदेही सुनिश्चित करने की बात कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर अफगानों को जबरन वापस भेजने के लिए तालिबान के साथ सहयोग कर रहे हैं। इससे उनकी विश्वसनीयता कमजोर पड़ रही है।’’
ईयू के किसी भी देश ने अब तक तालिबान को मान्यता नहीं दी है।
तालिबान के इस पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में तालिबान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, न्यूजीलैंड में जन्मे अब्दुल कहार बल्खी भी शामिल हैं। बेल्जियम ने तालिबान प्रतिनिधिमंडल को 24 घंटे का वीजा जारी किया है।
चूंकि न तो बेल्जियम और न ही यूरोपीय संघ तालिबान सरकार को आधिकारिक रूप से मान्यता देता है, इसलिए यह बैठक न तो किसी सरकारी भवन में और न ही ईयू या बेल्जियम के किसी संस्थागत स्थल पर आयोजित की जाएगी।
यूरोपीय आयोग के एक प्रवक्ता ने सोमवार को कहा कि समूह के 20 देशों ने अक्टूबर में एक पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें मजबूत प्रवासन नीतियों की मांग की गई थी। इसमें निर्वासन की प्रक्रिया को और तेज़ पर भी जोर दिया गया था।
पहली ईयू-तालिबान बैठक जनवरी में अफगानिस्तान में हुई थी, जब यूरोपीय आयोग ने काबुल में एक मिशन भेजा था।
पिछले एक साल में लगभग 30 लाख अफगान नागरिकों को पाकिस्तान और ईरान से वापस भेजने के चलते अफगानिस्तान में मानवीय संकट और गहरा गया है, क्योंकि देश पहले से ही खाद्य और आर्थिक संकटों से जूझ रहा है।
एपी आशीष दिलीप
दिलीप