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अग्रिम जमानत देने की शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए : अदालत

नयी दिल्ली, 23 जून (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने निवेश से जुड़े कथित धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तारी-पूर्व जमानत की अर्जी खारिज करते हुए कहा है कि अग्रिम जमानत देने की शक्ति एक असाधारण उपाय है और इसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए।

अवकाशकालीन न्यायाधीश सुगंधा अग्रवाल आरोपी आनंद तिवारी की अग्रिम जमानत अर्जी पर सुनवाई कर रही थीं। दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ ने आनंद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी।

अदालत ने 18 जून के एक आदेश में कहा, ‘‘अग्रिम जमानत देने की शक्ति एक असाधारण उपाय है और इसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए।’’

इसने कहा, ‘‘इस मामले में आरोप एक बड़े निवेश घोटाले से जुड़े हैं, जिसमें शिकायतकर्ता को अपनी मेहनत की कमाई के 50 लाख रुपये देने के लिए बहलाया-फुसलाया गया था।’’

जांच के मुताबिक, मेसर्स बुल्सरा प्राइवेट लिमिटेड का बैंक खाता उन लाभार्थियों में से एक का पाया गया है, जिन्हें धोखाधड़ी से हासिल रकम का कुछ हिस्सा मिला था और आवेदक या आरोपी उस कंपनी के निदेशकों में से एक था।

अदालत ने कहा, ‘‘दो बार नोटिस मिलने की बात मानने के बावजूद, आवेदक जांच में शामिल नहीं हुआ है। आवेदक का यह व्यवहार दिखाता है कि न तो वह जांच में शामिल हुआ और न ही उसने जांच एजेंसी का सहयोग किया।’’

अदालत ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने अपने जवाब में साफ तौर पर कहा है कि जांच शुरुआती चरण में है और पूरी साजिश का पता लगाने और धोखाधड़ी की बाकी रकम बरामद करने के लिए आवेदक से हिरासत में पूछताछ ज़रूरी है।

अदालत ने गौर किया कि एक और निदेशक, विजय मौर्य की अग्रिम ज़मानत अर्जी खारिज कर दी गई थी।

जज ने कहा, ‘‘मुझे याचिकाकर्ता को सुरक्षा देने का कोई आधार नहीं दिखता, और इसलिए, अग्रिम ज़मानत की यह अर्ज़ी खारिज की जाती है।’’

भाषा सुरेश मनीषा

मनीषा