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झारखंड: शीर्ष वन अधिकारी ने पर्यावरण क्षति को कम करने के लिए हरित प्रौद्योगिकी अपनाने की वकालत की

रांची, 22 मार्च (भाषा) झारखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल के प्रमुख संजीव कुमार ने रविवार को विकास और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए हरित प्रौद्योगिकी को व्यापक रूप से अपनाने का आह्वान किया।

झारखंड वन विभाग द्वारा आयोजित ‘अखिल भारतीय वसंत कला शिविर’ के लिए भारत भर से यहां एकत्रित हुए 55 प्रख्यात कलाकारों को अधिकारी ने बताया कि निरंतर प्रयासों के कारण राज्य में वन क्षेत्र लगभग 58 वर्ग किलोमीटर बढ़ गया है।

उन्होंने कहा, 'प्रकृति को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तीव्र विकास के इस युग में हरित प्रौद्योगिकी को अपनाना चाहिए। राज्य वन विभाग लोगों में इसके प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए निरंतर प्रयासरत है, क्योंकि प्रकृति से परे कुछ भी नहीं है।'

इस कार्यक्रम के बारे में अधिकारी ने कहा, 'चित्रकला और रेखाचित्र कला के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त करना संचार के सबसे पुराने रूपों में से एक है।’’ उन्होंने जोर देकर कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को प्रकृति के संरक्षण के लिए एक साथ आने के लिए प्रेरित करना है।

उन्होंने कहा, ‘‘प्रकृति को विनाश से बचाने के लिए कदम उठाएं। हमारे प्रयास तभी सफल हो सकते हैं जब हम अपनी जीवनशैली में प्रकृति के अनुकूल व्यवहारिक बदलाव लाएं।’’

कुमार ने कहा कि राज्य में वन क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि 2023 के राष्ट्रीय वन सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार राज्य के वन क्षेत्र में लगभग 58 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है, जबकि इससे पहले इसमें 110 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई थी।

आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखंड सहित पूरे देश के लगभग 55 समकालीन और स्थानीय कलाकारों ने इस शिविर में भाग लिया, जिसमें प्रकृति के संरक्षण को समर्पित 50 से अधिक चित्रों का प्रदर्शन किया गया।

उन्होंने कहा, 'प्रकृति में रहने का अधिकार सभी को है, चाहे वह पक्षी हो, जानवर हो या मनुष्य। हम प्रकृति से अलग नहीं हो सकते। फिर भी, आजकल लोग प्रकृति के भीतर रहते हुए भी उससे विमुख होते जा रहे हैं।'

आंध्र प्रदेश के गुंटूर विश्वविद्यालय के कलाकार श्रीधर पटनला ने कार्यक्रम में भाग लेते हुए कहा, 'इससे आने वाली पीढ़ियों को बहुत नुकसान पहुंचता है। मनोवैज्ञानिक रूप से भी, हमारी सोच तेजी से केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा की ओर ही केंद्रित होती जा रही है। इसीलिए लोगों को यह याद दिलाना महत्वपूर्ण हो गया है कि प्रकृति से उनका जुड़ाव अधिक आवश्यक है।'

भाषा तान्या संतोष

संतोष