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क्या होती है सत्ता विरोधी लहर; पूर्व डीजीपी सिंह ने किताब में किया विश्लेषण

(शीर्षक और इंट्रो में फेरबदल के साथ रिपीट)

चंडीगढ़, 22 मार्च (भाषा) सत्ता विरोधी लहर लाखों छोटी-छोटी संस्थागत विफलताओं का संचित परिणाम होती है जिनमें से प्रत्येक विफलता इतनी छोटी होती है कि सुर्खियां नहीं बटोर पाती लेकिन सामूहिक रूप से ये इतनी बड़ी होती हैं कि सरकार को बदल सकती हैं।

हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ओ पी सिंह की आगामी पुस्तक में मुख्य रूप से इसी बात का जिक्र किया गया है कि किस प्रकार सरकार के स्तर पर छोटी छोटी विफलताएं लाखों नागरिकों पर बोझ बन जाती हैं जिससे वह निराशा पैदा होती है जिसे लोकतंत्र ‘सत्ता विरोधी लहर’ कहता है।

‘फियर टैक्स: व्हेन कॉशन कॉस्ट्स मोर दैन करप्शन’ नामक पुस्तक में, सिंह ने तीन कारकों की परस्पर क्रिया का वर्णन करने के लिए एक सूत्र प्रस्तावित किया है, जिसमें ‘भय, x नियम x टकराव’ का जिक्र किया गया है।

सिंह का तर्क है कि चूंकि यह संबंध गुणात्मक है, इसलिए प्रणाली के भीतर व्याप्त भय को कम किए बिना प्रौद्योगिकी में सुधार करना या प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण करना नागरिक पर पड़ने वाले बोझ को कम नहीं करता है।

भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के 1992 बैच के अधिकारी, जो 2025 में सेवानिवृत्त हुए, अपने सेवाकाल के दो दशक से भी अधिक पुराने एक मामले के माध्यम से ‘तर्कसंगत त्याग’ का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

पुस्तक में बताया गया है कि हरियाणा में एक धनी व्यापारी की कार ने सड़क किनारे एक मोची को कुचल दिया।

आरोपी को पूछताछ के लिए बुलाने की कोशिश करने वाले अधिकारियों का कुछ ही महीनों में तबादला हो गया। इसलिए, बाद के अधिकारियों ने तर्कसंगत निष्कर्ष निकाला और उन्होंने फाइल को रोक दिया, उसे इधर-उधर कर दिया, या ऐसे अवलोकन जोड़ दिए जिनसे उनकी तत्परता तो दर्ज हो गई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

इस बीच, मोची की पत्नी हर दिन बीमा मुआवजे के लिए पुलिस के पास चक्कर काटती रही। मुआवजा एक फाइल के चलते अटका था जिसे 15 अधिकारियों ने देखा, लेकिन किसी ने भी फैसला नहीं किया।

सिंह का तर्क है, ‘‘पहले के अधिकारियों के तबादले ही व्यवस्था का संकेत थे। हर अधिकारी जिसने इसे देखा, वह संकेत समझ गया। फाइल को ऊपर रखो। उसे एक तरफ कर दो। जब फाइल पूरी हो तो उस पर तुम्हारा नाम न हो। यह तर्कसंगत जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है।’’

अंततः इस मामले को संभालने के लिए नियुक्त किए गए सिंह का कहना है कि उन्होंने आरोपी को गिरफ्तार करने का विकल्प चुना।

उनका कहना था, ‘‘मामला सुलझ गया। पीड़ित की पत्नी को न्याय मिला और उन्हें वह मुआवजा भी मिल गया जिसका वे वर्षों से इंतजार कर रहे थे।’’

पूर्व डीजीपी ने अपने सेवाकाल की एक और घटना का हवाला देते हुए बताया कि त्वरित कार्रवाई से कितना फर्क पड़ सकता है।

वर्ष 2008-12 तक हरियाणा के खेल निदेशक के रूप में भी कार्य करने वाले सिंह कहते हैं कि 2011 में नसीम अहमद नाम का एक कोच उनके कार्यालय में आया और कहा कि उनके पास पानीपत के कुछ लड़के हैं जो भाला फेंक खेल में प्रदर्शन करना चाहते हैं।

सिंह कहते हैं, ‘‘मैंने उसी दोपहर हां कह दी और एक लाख रुपये मंजूर कर दिए। उन लड़कों में से एक नीरज चोपड़ा थे।’’

चोपड़ा ने 2021 के तोक्यो ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीता था।

किताब में तर्क दिया गया है कि 'डर टैक्स' तीन बढ़ते स्तर पर काम करता है। पहले स्तर पर देरी, मुश्किल, खर्च में बढ़ोतरी, और उम्मीद के पूरा न होने के रूप में आम नागरिक को चुपचाप इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

दूसरे स्तर पर, ये अलग-अलग खर्च सरकार के पूरे कार्यकाल में लाखों नागरिकों पर बोझ बन जाते हैं जिससे वह निराशा पैदा होती है जिसे लोकतंत्र“सत्ता विरोधी” कहता है।

सिंह कहते हैं, “सत्ता विरोध बिना किसी वजह के नहीं होता। यह बैलेट बॉक्स में आने वाला 'डर टैक्स' है। अभी कोई भी सरकार इसे नहीं मापती। लेकिन हर सरकार को आखिरकार इसका भुगतान करना पड़ता है।”

सिंह एक अन्य विषय पर तर्क देते हैं, “जो अधिकारी रिश्वत लेता है, उस पर मुकदमा चलता है। जो अधिकारी तीन साल तक फाइल को लटकाए रखता है, उसका कुछ नहीं बिगड़ता। जब तक दोनों की लागत एक ही खाते में दर्ज नहीं होगी, तब तक हिसाब नहीं बदलेगा।”

भाषा शफीक नरेश

नरेश

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