नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई और ईडी से बुधवार को अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (एडीएजी), अनिल अंबानी और समूह की कंपनियों से जुड़ी कथित 40,000 करोड़ रुपये की बैंकिंग एवं कॉरपोरेट धोखाधड़ी मामले में ‘‘अकारण देरी’’ को लेकर नाराजगी जताई और इस संबंध में ‘‘निष्पक्ष, त्वरित’’ जांच के निर्देश दिए।
जनहित याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता और पूर्व नौकरशाह ईएएस सरमा के अनिल अंबानी के देश छोड़कर जाने की आशंका जताए जाने पर अंबानी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने शीर्ष अदालत को आश्वासन दिया कि वह उसकी (न्यायालय की) पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने अंबानी और एडीएजी कंपनियों के खिलाफ जारी जांच में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की गई प्रगति पर चार सप्ताह के भीतर नयी स्थिति रिपोर्ट मांगी है।
पीठ ने कहा, ‘‘ईडी और सीबीआई दोनों ही जांच एजेंसियों ने जांच शुरू करने में पहले ही समय ले लिया है। इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि दोनों जांच एजेंसियां उचित कार्रवाई करेंगी।’’ पीठ ने ईडी को एडीएजी और अन्य के खिलाफ जांच को शीघ्रता से तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचा वरिष्ठ अधिकारियों का एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया।
पीठ ने अनिल अंबानी और एडीएजी की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों मुकुल रोहतगी एवं श्याम दीवान को जनहित याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया।
पीठ ने प्रक्रिया के दौरान सीबीआई के दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कहा कि एजेंसी ने अन्य कई वित्तीय संस्थानों से शिकायतें मिलने के बावजूद भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की शिकायत के आधार पर 2025 में केवल एक प्राथमिकी दर्ज की।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘सीबीआई द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण प्रक्रियात्मक कानून के अनुरूप प्रतीत नहीं होता है।’’ उन्होंने कहा कि प्रत्येक बैंक ने अलग लेनदेन की शिकायत की है और इसके लिए एक अलग प्राथमिकी दर्ज होना जरूरी है।
इसके अलावा, पीठ ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह अपनी जांच का दायरा बढ़ाकर उसमें बैंक अधिकारियों की संभावित ‘‘मिलीभगत’’ को भी शामिल करे।
पीठ ने कहा, ‘‘ईडी और सीबीआई दोनों ने पहले ही समय लिया है और इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि दोनों एजेंसियां शीघ्रता से कार्रवाई करेंगी।’’
सरमा की जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत से अन्य हाई-प्रोफाइल डिफॉल्टर (ऋण गबन करने वालों) के देश छोड़कर भाग जाने के उदाहरणों का हवाला देते हुए एडीएजी चेयरमैन को देश छोड़कर जाने से रोकने का निर्देश देने का आग्रह किया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि अंबानी के खिलाफ पहले ही लुकआउट सर्कुलर जारी किए जा चुके हैं।
सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को सूचित किया कि एडीएजी समूह की विभिन्न कंपनियों के माध्यम से कथित तौर पर गबन की गई कुल राशि लगभग 40,000 करोड़ रुपये है।
पीठ ने ईडी के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि रिलायंस कम्युनिकेशंस के ऋण 40,000 करोड़ रुपये से अधिक हैं और जांच एजेंसी ने ‘‘अपराध से प्राप्त आय’’ का आकलन 20,000 करोड़ रुपये से अधिक किया है।
ईडी ने बताया कि 8,078 करोड़ रुपये की संपत्ति पहले ही अस्थायी रूप से जब्त कर ली गई है।
भूषण ने बताया कि रिलायंस कम्युनिकेशंस पर 47,000 करोड़ रुपये का कर्ज था लेकिन उसे मात्र 430 करोड़ रुपये में बेच दिया गया जो उसके अनुमानित मूल्य का लगभग एक प्रतिशत है और यह कंपनी अनिल अंबानी के भाई की है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘दिवालियापन और दिवालियापन संहिता का दुरुपयोग हो रहा है।’’
एडीएजी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि समूह की दो कंपनियों, रिलायंस पावर और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने पहले ही 20,000 करोड़ रुपये चुका दिए हैं।
दीवान ने कहा, ‘‘धन की हेराफेरी का तो सवाल ही नहीं उठता। ये कंपनियां पैसे वापस चुकाने के लिए ही बनी हैं।’’
इससे पूर्व 23 जनवरी को पीठ ने सीबीआई और ईडी को इस मामले में 10 दिनों के भीतर सीलबंद लिफाफे में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था।
पीठ ने कथित धोखाधड़ी की अदालत की निगरानी में जांच के अनुरोध वाली जनहित याचिका पर अनिल अंबानी और एडीएजी को नए नोटिस भी जारी किए थे और उन्हें वकील के माध्यम से पेश होने का अंतिम अवसर दिया था।
इससे पूर्व भूषण ने आरोप लगाया था कि जांच एजेंसियां इस बड़े बैंकिंग घोटाले में बैंकों और उनके अधिकारियों की कथित मिलीभगत की जांच नहीं कर रही हैं।
भूषण ने कहा कि यह ‘‘संभवतः भारत के इतिहास का सबसे बड़ा कॉरपोरेट धोखाधड़ी’’ का मामला है।
वकील ने आरोप लगाया कि प्राथमिकी 2025 में दर्ज की गई थी, जबकि धोखाधड़ी 2007 और 2008 से जारी थी।
ईएएस सरमा द्वारा दायर जनहित याचिका में अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस एडीएजी की कई संस्थाओं में सार्वजनिक धन के व्यवस्थित गबन, वित्तीय विवरणों में हेराफेरी और संस्थागत मिलीभगत का आरोप लगाया गया है।
भाषा सुरभि पवनेश
पवनेश