मरीजों को सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराने के लिए योगी सरकार ने रक्त केंद्रों की निगरानी और सख्त करने की पहल की है। उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (यूपीएफएसडीए) ने दूसरे राज्यों से बड़ी मात्रा में मंगाए जाने वाले रक्त और उसके अवयवों की गुणवत्ता जांच प्राप्तकर्ता केंद्र पर भी कराने का प्रस्ताव राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद (एनबीटीसी) को भेजा है। इसके तहत हर खेप की कम से कम एक प्रतिशत रक्त यूनिट या प्रति खेप न्यूनतम एक यूनिट, जो भी अधिक हो, की जांच कराने की सिफारिश की गई है।
इस पहल का उद्देश्य हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी और एचआईवी जैसे संक्रमणों के जोखिम को कम करना और यह सुनिश्चित करना है कि मरीजों तक पहुंचने वाला रक्त तय मानकों के अनुसार एकत्र, जांचा और सुरक्षित रखा गया हो। प्रस्ताव के अनुसार, जांच स्थानीय औषधि निरीक्षक की मौजूदगी में राजकीय रक्त केंद्र में कराई जा सकती है।
208 रक्त केंद्रों के निरीक्षण में मिलीं गंभीर खामियां
यूपीएफएसडीए के आयुक्त डॉ. रोशन जैकब के आदेश पर मार्च 2026 में चैरिटेबल ट्रस्टों द्वारा संचालित 208 रक्त केंद्रों का निरीक्षण किया गया था। इस दौरान 55 केंद्रों के लाइसेंस निलंबित किए गए। निरीक्षण में संक्रमण जांच, तापमान नियंत्रित भंडारण, तकनीकी स्टाफ की उपलब्धता, साफ-सफाई और जरूरी रिकॉर्ड रखने में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।
खास तौर पर दूसरे राज्यों से पैक्ड रेड ब्लड सेल्स (पीआरबीसी) की बड़ी खेप मंगाने के दौरान जरूरी दस्तावेजों और गुणवत्ता सत्यापन में कमियां पाई गईं। कुछ केंद्रों पर रक्त मंगाने का लिखित कारण, संक्रमण जांच रिपोर्ट, डोनर फॉर्म और परिवहन के दौरान निर्धारित तापमान बनाए रखने के रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं थे।
दूसरे राज्यों के आपूर्तिकर्ता रक्त केंद्रों के लाइसेंस और वहां अपनाई जा रही जांच प्रक्रिया की पुष्टि करना भी चुनौतीपूर्ण पाया गया। इन कमियों को देखते हुए बल्क ट्रांसफर की निगरानी मजबूत करने की जरूरत महसूस की गई।
हर खेप के साथ जरूरी होंगे दस्तावेज और तापमान का रिकॉर्ड
यूपीएफएसडीए ने 21 अगस्त 2026 को प्रदेश के सभी रक्त केंद्रों के लिए निर्देश जारी किए थे। इनके अनुसार, दूसरे राज्यों से पीआरबीसी की बल्क आपूर्ति लेने पर प्रत्येक यूनिट के साथ मूल रक्त की पायलट ट्यूब के कम से कम तीन सेगमेंट, कुल लगभग 30 सेंटीमीटर लंबाई में, प्राप्त करना अनिवार्य बताया गया है।
इसके साथ हर यूनिट की ट्रांसफ्यूजन-ट्रांसमिसिबल इन्फेक्शन (टीटीआई) जांच रिपोर्ट और डोनर फॉर्म की प्रति रखना जरूरी है। डोनर फॉर्म में रक्तदान के बाद यूनिट को मूल केंद्र के बाहर इस्तेमाल करने की सहमति दर्ज होनी चाहिए।
रक्त के परिवहन के दौरान तापमान का रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखना होगा। प्राप्तकर्ता केंद्र में पर्याप्त क्षमता वाले ब्लड स्टोरेज कैबिनेट और तापमान दर्ज करने वाले थर्मोग्राफ की व्यवस्था होना जरूरी है। इससे यह जांचने में मदद मिलेगी कि रक्त को तय तापमान पर सुरक्षित रखा गया या नहीं।
एनबीटीसी को लेबलिंग और पूर्व सूचना अनिवार्य करने का सुझाव
यूपीएफएसडीए ने राष्ट्रीय स्तर पर नियमों को मजबूत करने के लिए तीन प्रमुख सिफारिशें की हैं।
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प्रत्येक रक्त यूनिट के साथ कम से कम दो पायलट ट्यूब सेगमेंट, कुल लगभग 20 सेंटीमीटर लंबाई में, उपलब्ध कराए जाएं।
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रक्त यूनिट पर ‘बल्क ट्रांसफर्ड यूनिट’ लिखा हो। साथ ही आपूर्तिकर्ता और प्राप्तकर्ता केंद्र का नाम, पता और लाइसेंस संख्या दर्ज हो।
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बल्क ट्रांसफर से पहले प्राप्तकर्ता केंद्र को स्थानीय औषधि निरीक्षक को सूचना देना अनिवार्य किया जाए।
इसके अलावा, हर खेप के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) और चेकलिस्ट तैयार करने का प्रस्ताव है। इसमें रक्त बैग और पायलट ट्यूब की स्थिति, संक्रमण जांच रिपोर्ट, दोनों केंद्रों का विवरण, ट्रांसफर की समय-सीमा और परिवहन के दौरान तापमान का रिकॉर्ड शामिल होगा।
संक्रमण जांच से लेकर सात दिन तक नमूने सुरक्षित रखने के निर्देश
यूपीएफएसडीए ने रक्त केंद्रों में संक्रमण जांच और रिकॉर्ड संधारण को लेकर भी सख्ती की है। आपातकालीन परिस्थितियों को छोड़कर रक्त नमूनों की संक्रमण जांच 100 प्रतिशत एलिसा (ELISA) या केमिलुमिनेसेंस तकनीक से करना अनिवार्य बताया गया है।
डोनर रजिस्टर में रक्तदाता का आधार कार्ड और आधार से लिंक मोबाइल नंबर दर्ज करना होगा। वहीं, इशू रजिस्टर में मरीज या उसके तीमारदार का आधार कार्ड और लिंक मोबाइल नंबर दर्ज करने के निर्देश हैं। पायलट ट्यूब और मरीज के रक्त नमूने कम से कम सात दिन तक सुरक्षित रखने होंगे।
रक्त और उसके अलग-अलग अवयवों को निर्धारित तापमान पर अलग-अलग रखना, थर्मोग्राफ रिकॉर्ड सुरक्षित रखना, स्वच्छता बनाए रखना और जरूरी उपकरणों का साल में कम से कम एक बार कैलिब्रेशन कराना भी अनिवार्य है। रक्त केंद्रों को डोनर रजिस्टर, मास्टर रजिस्टर, इशू रजिस्टर, ब्लड बैग और स्टॉक रजिस्टर अपडेट रखने होंगे।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य रक्तदाता से मरीज तक प्रत्येक यूनिट का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना है, ताकि किसी शिकायत या संक्रमण की आशंका होने पर रक्त के स्रोत और जांच से जुड़ी जानकारी आसानी से मिल सके।
तकनीकी स्टाफ नहीं तो नहीं चलेगा ब्लड बैंक
रक्त केंद्रों में योग्य तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता को भी अनिवार्य किया गया है। तकनीकी स्टाफ की अनुपस्थिति में रक्त केंद्र का संचालन नहीं किया जा सकेगा। गंभीर अनियमितता या जरूरी रिकॉर्ड में कमी मिलने पर लाइसेंस निरस्त करने की कार्रवाई भी की जा सकती है।
चैरिटेबल ट्रस्टों द्वारा संचालित रक्त केंद्रों के नए लाइसेंस और नवीनीकरण के लिए भी कड़े मानक निर्धारित किए गए हैं। ट्रस्ट का कम से कम दो वर्षों से कार्यरत होना, पर्याप्त संसाधन होना और किसी एक व्यक्ति या परिवार का नियंत्रण नहीं होना जरूरी है। ट्रस्ट को अपनी धर्मार्थ गतिविधियों, ऑडिट रिपोर्ट, सदस्यों के विवरण और संचालित रक्त केंद्रों के लाइसेंस से जुड़े दस्तावेज भी उपलब्ध कराने होंगे।
मरीजों तक सुरक्षित रक्त पहुंचाना लक्ष्य
यूपीएफएसडीए की इस पहल से बल्क ट्रांसफर के दौरान रक्त की गुणवत्ता, सुरक्षित परिवहन और भंडारण की निगरानी मजबूत करने में मदद मिलेगी। प्राप्तकर्ता केंद्र पर जांच, औषधि निरीक्षक को पूर्व सूचना और रक्तदाता से मरीज तक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की व्यवस्था से रक्त केंद्रों की जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
विभाग का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीजों को रक्त चढ़ाने से पहले उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा से जुड़े जरूरी मानकों का पालन हो तथा रक्त के जरिए फैलने वाले गंभीर संक्रमणों का जोखिम कम किया जा सके।