जम्मू-कश्मीर में चुनावी प्रचार का शोर खूब सुनाई दे रहा है तो वहीं वर्ष 2001 में संसद में हुए हमले के दोषी अफजल गुरू को 9 फरवरी को 2013 को फांसी की सजा दी गई थी. लेकिन इतिहास के इस पन्ने को नेशनल कॉन्फ्रेंस ने चुनावों में झाड़ पोंछ कर पलट दिया. दरअसल इस मुद्दे पर उमर अबदुल्लाह ने एसा बयान दिया कि घाटी की आवोहवा अचानक से बदल गई है। गांदरबल से नेशनल कॉन्फ्रेंस के उम्मीद्वार और कांग्रेस के साझेदार ने एसा कुछ कह दिया है कि बीजेपी अब तिलमिला रही है लेकिन कांग्रेस बैकफुट पर है। जम्मू-कश्मीर में सवाल सिर्फ अफजल के इर्द गिर्द ही नहीं घूम रहा बल्कि वहीं की स्थानीय पार्टियां उन मुद्दों को कुरेद रहीं है जिनके जख्म से बड़ी मुश्किल से जन्नत उभर पाई है और इसकी झलक लोकसभा चुनावों में देखने को मिली जब लोगों ने बढ़-चढ़ कर मतदान में हिस्सा लिया. अब सबसे बड़ा सवाल ये कि भावनात्मक मुद्दों के आधार पर राजनीतिक पार्टियां आखिर क्या हासिल करना चाहती हैं, क्या इन मुद्दों से हमारे समाज, राज्य या देश का भला होगा?
कश्मीर में इस बार 370 आर-पार, अमित शाह ने दे डाली चुनौती
जम्मू-कश्मीर में जो इतिहास हो गया उसकी चर्चा आखिर वर्तमान में खूब की जा रही है. 5 अगस्त 2019 को जिस अनुच्छेद 370 के खात्मे का एलान गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में किया था उसे वर्तमान के विधानसभा चुनावों में मुद्दा बनाया जा रहा है। अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों के मद्देनजर जनसभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस को खtब घेरा और उमर अबदुल्लाह और राहुल गांधी को चुनौती भी दे डाली साथ ही जनता के बीच उम्मीद की लकीर भी खींच दी. उन्होंने कहा कि 370 को केवल मोदी और केंद्र सरकार ही हटा सकते हैं।
गौरतलब है कि गत शुक्रवार को उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर सरकार का अफजल गुरु की फांसी से कोई लेना-देना नहीं था। अगर होता तो राज्य सरकार की अनुमति से ऐसा करना पड़ता, जिसके बारे में मैं आपको स्पष्ट शब्दों में बता सकता हूं कि ऐसा नहीं होता, हम ऐसा नहीं करते। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि उसे फांसी देने से कोई उद्देश्य पूरा हुआ है। केंद्र सरकार ने अफजल गुरू को फांसी देने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार की अनुमति या सहमति नहीं ली थी। संसद हमले में शामिल अफजल गुरू को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने नौ फरवरी 2013 को फांसी दी थी। उस समय जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला ही मुख्यमंत्री थे।
साल 2001 में हुआ था संसद पर हमला
13 दिसंबर 2001 को संसद पर आतंकी हमला हुआ था। इस हमले में सुरक्षाकर्मियों समेत नौ लोग मारे गए थे और 18 लोग घायल हुए थे। संसद हमले के पांच आतंकियों को भी नेस्तनाबूद कर दिया गया था। इनकी पहचान हमजा, हैदर उर्फ तुफैल, राणा, रणविजय और मोहम्मद के तौर पर हुई थी। वहीं दिल्ली पुलिस ने दो दिन बाद यानी 15 दिसंबर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी और संसद हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को पकड़ा. जिसे नौ फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई।