Breaking News

कप सिरप केस: कोर्ट में शुभम जायसवाल के खिलाफ 40 हजार पन्नों की चार्टशीट दाखिल     |   UP: CM योगी ने वृंदावन नाव हादसे का संज्ञान लिया, त्वरित रेस्क्यू के निर्देश दिए     |   वृंदावन नाव हादसा: डीएम ने 6 मौतों की पुष्टि की, 14 से अधिक लोगों को बचाया गया     |   इजराइली एयर फोर्स के हमले से दक्षिणी लेबनान के अल-शहाबिया शहर में भारी तबाही     |   ‘राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ लेने पर नीतीश कुमार को बधाई’, PM मोदी का X पोस्ट     |  

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने सिंधी में भारतीय संविधान का संस्करण किया जारी

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में भारतीय संविधान के सिंधी भाषा के नवीनतम संस्करण का विमोचन किया। यह संस्करण देवनागरी और फारसी, दोनों लिपियों में जारी किया गया है। उपराष्ट्रपति सचिवालय की ओर से जारी आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने सिंधी भाषा दिवस के मौके पर सिंधी भाषी समुदाय को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने सिंधी को दुनिया की सबसे प्राचीन और मधुर भाषाओं में से एक बताते हुए कहा कि इसकी साहित्यिक परंपरा वेदांत दर्शन और सूफी विचारधारा के अद्भुत संगम को दर्शाती है, जो एकता, प्रेम और भाईचारे के सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देती है।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद पहली बार सिंधी भाषा में, विशेष रूप से देवनागरी लिपि में, संविधान का प्रकाशन भाषाई समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवंत आत्मा है, जो देश की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता है, अधिकारों की रक्षा करता है और लोकतांत्रिक शासन का मार्गदर्शन करता है।

उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार द्वारा संविधान को विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इससे नागरिक अपनी मातृभाषा में संविधान को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी और विश्वास मजबूत होता है।उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारत उन चुनिंदा देशों में से है, जहां संविधान को अनेक भाषाओं में उपलब्ध कराया गया है। उन्होंने बोडो, डोगरी, संथाली, तमिल, गुजराती और नेपाली जैसी भाषाओं में किए गए अनुवादों का भी जिक्र किया और कहा कि ये प्रयास भारत की भाषाई विविधता का उत्सव मनाते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करते हैं।

सिंधी समुदाय के ऐतिहासिक सफर को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन के बाद के कठिन समय में यह भाषा एकता और धैर्य का प्रतीक बनी रही। उन्होंने बताया कि 1967 में 21वें संविधान संशोधन के जरिए सिंधी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया, जिससे इसकी सांस्कृतिक पहचान को मान्यता मिली और इसके संरक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

उन्होंने सभी भाषाओं के प्रति समान सम्मान देने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि हर व्यक्ति अपनी मातृभाषा से प्रेम करता है, लेकिन सभी भाषाओं का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है। भारत की ताकत उसकी विविधता में है और भाषाएं संस्कृति, परंपरा और पहचान की महत्वपूर्ण वाहक हैं।

उपराष्ट्रपति ने विधि एवं न्याय मंत्रालय, विशेष रूप से क्षेत्रीय भाषा अधिकारियों के प्रयासों की सराहना की और विश्वास जताया कि इस तरह की पहलें नागरिकों को सशक्त बनाएंगी और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को मजबूत करेंगी। उन्होंने नागरिकों से अपनी मातृभाषा के साथ-साथ देश की सामूहिक भाषाई विरासत का भी सम्मान करने का आह्वान किया और “राष्ट्र प्रथम” की भावना को दोहराया। इस अवसर पर केंद्रीय विधि एवं न्याय तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, लोकसभा सांसद शंकर लालवानी और विधायी विभाग के सचिव राजीव मणि सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।