कभी पारंपरिक चरखे की आवाज महात्मा गांधी की अगुवाई में आजादी की लड़ाई का प्रतीक थी। मध्य प्रदेश के मैहर में सुलखामा गांव के हर घर में चरखे की आवाज गूंजती थी। गांधी जी ने देश के लोगों की आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए चरखे को ताकतवर माध्यम बनाया था।
अब गांव में कुछ ही परिवार चरखे का इस्तेमाल करते हैं। कंबल बनाने के लिए हाथ से काते गए कपड़े चाहिए, जिसके लिए चरखे का इस्तेमाल होता है। जो बुनकर अब भी चरखा कात रहे हैं, वे बुजुर्ग हैं, क्योंकि कम आमदनी की वजह से युवा पीढ़ी ने इससे पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है।
जिला प्रशासन ने चरखा कातने वालों की मदद के लिए पहल करने का वादा किया है। मशीन से बने सस्ते और रखरखाव में आसान कपड़ों की वजह से चरखों पर काती गई खादी धीरे-धीरे अपना वजूद खोती जा रही है। अब कुछ ही बुनकर इस कला को बचाने में जुटे हैं। उन्हें लगता है कि सरकारी मदद के बिना ये कला विलुप्त होने के कगार पर है।