क्या NDA में सबकुछ ठीक नहीं है? ये सवाल एक बार फिर से गूंजने लगा है. जिसका कारण है आरक्षण में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला. दरअसल एससी-एसटी में आरक्षण के भीतर आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है उस पर रार बढ़ती ही जा रही है. यहां तक की सत्तारूढ़ एनडीए भी इस फैसले पर दो फाड़ नजर आ रहा है. एक तरफ जहां एलजेपी (आर) प्रमुख चिराग पासवान और केंद्रीय मंत्री ने इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाई है तो वहीं केंद्रीय मंत्री और हम प्रमुख जीतन राम मांझी ने इस फैसले का स्वागत किया है.
खबर है कि चिराग पासवान की पार्टी इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल कर सकती है. तो वही मांझी का कहना है कि ये फैसला दस साल पहले ही आ जान चाहिए था. दोनों नेताओं ने अपना रुख सामने पेश किया है जोकि एक दूसरे के विरोध में है और दोनों ही नेता एनडीए का हिस्सा है और केंद्रीय मंत्री भी हैं. देखा जाए तो दोनों की बातों के पीछे एक अहम कारण भी है और वो कारण बिहार की जनसंख्या में छुपा है. दरअसल बिहार सरकार ने पिछले साल 2 अक्टूबर को जातिय सर्वेक्षण के आंकड़े जारी किए थे जिसके मुताबिक-
दुसाध जाति- 5.31 फीसदी आबादी
मुसहर जाति- 3.08 फीसदी आबादी
अनुसुचित जातियों के लिए आरक्षित नौकरीयों में दुसाध काफी आगे है. वहीं मुसहर इस मामले में पीछे है. इन आकंड़ों के आधार पर मांझी को लगता है कि अगर एससी, एसटी में सब कैटेगरी बनाई जाती है तो उनके समुदाय को फायदा हो सकता है. इसलिए वे इस फैसला को समर्थन कर रहे है और साथ ही चिराग का भी विरोध कर रहे है.