भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद राघव चड्ढा ने सोमवार को एक बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए अपनी ही स्थापित पार्टी आम आदमी पार्टी (AAP) से अलग होने का ऐलान किया। उन्होंने पार्टी के अंदर “टॉक्सिक वर्क एनवायरमेंट” होने का आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी का कामकाज काफी बदल गया है।
एक वीडियो संदेश में राघव चड्ढा ने कहा कि उन्होंने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में अपने करियर को छोड़कर राजनीति में कदम रखा था और करीब 15 साल अपनी “युवा उम्र” इस पार्टी को बनाने में लगाए। उन्होंने कहा, “मैं राजनीति में करियर बनाने नहीं आया था, बल्कि एक पार्टी की नींव रखने आया था, लेकिन आज यह पार्टी पहले जैसी नहीं रही।”
चड्ढा ने आरोप लगाया कि पार्टी के अंदर काम करने और संसद में बोलने तक की आजादी नहीं है। उन्होंने कहा कि अब पार्टी कुछ “भ्रष्ट और समझौता करने वाले लोगों” के नियंत्रण में आ गई है, जो निजी हितों के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पिछले कुछ समय से लग रहा था कि वह सही व्यक्ति हैं, लेकिन गलत पार्टी में हैं।
राघव चड्ढा ने बताया कि उन्होंने तीन विकल्पों पर विचार किया—राजनीति छोड़ देना, पार्टी के अंदर रहकर सुधार की कोशिश करना या फिर किसी अन्य मंच से “रचनात्मक राजनीति” करना। अंत में उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला लिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुल सात सांसदों ने पार्टी से अलग होने का निर्णय लिया है, जो संगठन के भीतर असंतोष को दर्शाता है।
इस बीच, राज्यसभा में बीजेपी की ताकत बढ़कर 113 हो गई है, क्योंकि सभापति सीपी राधाकृष्णन ने राघव चड्ढा समेत सात सांसदों के बीजेपी में विलय को मंजूरी दे दी है। इन सांसदों के AAP छोड़ने के बाद पार्टी को बड़ा झटका लगा है और अब राज्यसभा में उसकी संख्या घटकर केवल तीन रह गई है।राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने शुक्रवार को AAP से अलग होकर बीजेपी जॉइन कर ली थी। इनके अलावा हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी और स्वाति मालीवाल भी बीजेपी में शामिल हो गए हैं।
दूसरी ओर, AAP सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा के सभापति से इन सातों सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी। उन्होंने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत इस विलय को चुनौती दी। हालांकि, नियमों के अनुसार यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद किसी अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इस मामले में सातों सांसद इस शर्त को पूरा करते हैं। इस पूरे घटनाक्रम पर AAP नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “विश्वासघात” बताया है, वहीं बीजेपी ने इन नेताओं का स्वागत किया है।