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चावल निर्यातक अमेरिका में अतिरिक्त शुल्क के खतरे से बेपरवाह, 'डंपिंग' के आरोप को नकारा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही भारतीय चावल पर अतिरिक्त शुल्क लगाने पर विचार करने की बात कह रहे हों लेकिन भारतीय निर्यातक इसे लेकर बेफिक्र हैं। निर्यातकों का कहना है कि इस कदम से उनके व्यापार पर असर पड़ने की संभावना नहीं है। उनके मुताबिक भारत के कुल चावल निर्यात का सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही अमेरिका भेजा जाता है।

भारत हर साल लगभग 60 लाख मीट्रिक टन बासमती चावल निर्यात करता है। इसमें से ज्यादातर खेपें मध्य पूर्व, खाड़ी के देशों, यूरोप और अफ्रीका जाती हैं। जानकारों का कहना है कि अमेरिका की खरीद भारत के सालाना बासमती निर्यात का तीन प्रतिशत से कम है। वहीं ये देश के कुल चावल निर्यात के एक फीसदी से भी कम है।

निर्यातकों का कहना है कि अगर अमेरिका चावल पर अतिरिक्त शुल्क लगाता है, तो इसका असर मुख्य रूप से अमेरिकी ग्राहकों पर पड़ेगा क्योंकि इससे वहां चावल की कीमतें बढ़ जाएंगी। निर्यातकों का कहना है कि अमेरिकी बाजार में चावल सस्ते दामों पर बेचने के लगाए गए अमेरिकी अधिकारियों के आरोप पूरी तरह गलत हैं।

भारतीय निर्यातकों का ये रुख वाशिंगटन में भारतीय चावल पर अतिरिक्त शुल्क लगाने पर चल रही चर्चाओं के बीच सामने आया है। भारतीय चावल पर अमेरिका पहले से ही 50 फीसदी शुल्क लगाता है। चावल निर्यातकों के मुताबिक छह महीने पहले 10 फीसदी से शुरू हुआ और पिछले तीन महीनों में बढ़कर 25 फीसदी और फिर 50 फीसदी हो गए शुल्क का मांग पर कोई असर नहीं पड़ा है।

हालांकि, हरियाणा के चावल उत्पादकों का मानना ​​है कि अमेरिका द्वारा ज्यादा शुल्क लगाने से वे वैश्विक बाजार में चल रही होड़ में पिछड़ जाएंगे और वो भी ऐसे समय में जब किसान पहले से ही कई मुश्किलों से जूझ रहे हैं।

हालांकि निर्यातक इस बात का दावा करते हैं कि दूसरे बाजार भारतीय बासमती चावल के लिए तेजी से खुल रहे हैं। अब तक गैर-बासमती किस्मों का आयात कर रहे रूस ने अब बासमती चावल भी मंगवाना शुरू कर दिया है। ब्राजील और थाईलैंड जैसे बड़े चावल उत्पादक देश भी अब भारतीय बासमती खरीद रहे हैं।

भारत हाल ही में चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है। अगले साल घरेलू उत्पादन में चार से पांच फीसदी की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, क्योंकि किसानों को बेहतर कीमतों का फायदा मिल रहा है।