भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की कानूनी अनुमति पाने वाले पहले व्यक्ति हरीश राणा का अंतिम संस्कार राष्ट्रीय राजधानी में किया गया। राणा का निधन एम्स, नई दिल्ली में हुआ, जहां वे लंबे समय से विशेष चिकित्सा देखभाल में थे। यह घटना देश के कानूनी और चिकित्सा इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण मानी जा रही है।
एम्स द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, हरीश राणा का निधन 24 मार्च 2026 को शाम 4:10 बजे हुआ। वे पेलिएटिव ऑन्कोलॉजी यूनिट (IRCH) में भर्ती थे, जहां डॉ. (प्रो.) सीमा मिश्रा (एचओडी, ऑन्को-एनेस्थीसिया) के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक समर्पित टीम उनकी देखभाल कर रही थी। संस्थान ने इस कठिन समय में उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की।
इस महीने की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। राणा पिछले एक दशक से अधिक समय से वेजिटेटिव स्टेट में थे, जो 2013 में एक इमारत से गिरने के बाद हुई दुर्घटना के कारण हुआ था। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन (CANH) को हटाने की अनुमति दी, यह मानते हुए कि जीवन रक्षक उपचार जारी रखना मरीज के हित में नहीं है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है, ऐसे मरीज जिनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं होती, उनके जीवन को बनाए रखने वाले उपचार को हटाना या रोक देना, ताकि उन्हें स्वाभाविक रूप से मृत्यु प्राप्त हो सके। फैसला सुनाते समय अदालत ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि मरीज के परिवार और मेडिकल बोर्ड सहित सभी संबंधित पक्ष इस बात पर सहमत थे कि आक्रामक चिकित्सा उपचार जारी रखने का कोई अर्थ नहीं है।
पीठ ने यह भी कहा कि देश में जीवन के अंतिम चरण की देखभाल को लेकर व्यापक कानून का अभाव है और केंद्र सरकार से इस दिशा में कानून बनाने पर विचार करने का आग्रह किया। अदालत ने ‘कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018)’ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है और इसी आधार पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई थी अदालत ने कहा कि इस विषय पर स्पष्ट कानून के अभाव में उसे बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ता है और एक समर्पित कानून बनने से ऐसे संवेदनशील मामलों में अधिक स्पष्टता और निश्चितता आएगी।