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कुमाऊं में बैठकी होली की शुरुआत, हल्द्वानी में महिलाओं ने खेली फूलों की होली

उत्तराखंड के कुमाऊं की होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सुरों की एक प्राचीन परंपरा है। जहां फागुन की दस्तक के साथ ही फिजाओं में शास्त्रीय राग गूंजने लगते हैं। कहीं ढोलक की थाप पर महिलाओं का नृत्य है, तो कहीं 'छाप तिलक' के साथ अध्यात्म और संस्कृति का संगम। हल्द्वानी से लेकर पिथौरागढ़ की पहाड़ियों तक, कुमाऊंनी बैठकी होली का रंग अब गहराने लगा है। 

कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी में होली के हुड़दंग से पहले 'बैठकी होली' की मिठास घुल गई है। यहां महिलाओं की टोलियों ने कुमाऊंनी परंपराओं को सहेजते हुए गायन और वादन का शानदार समां बांधा। राष्ट्रीय दलों के नेताओं की मौजूदगी में महिलाओं ने न केवल पारंपरिक गीत गाए, बल्कि फूलों की होली खेलकर भाईचारे का संदेश भी दिया। यहां की होली में शास्त्रीय रागों के साथ-साथ लोक संस्कृति का अनूठा मिश्रण देखने को मिल रहा है।

सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में भी होली का रंग जमने लगा है। बेरीनाग के खितोली गांव स्थित प्रसिद्ध मोलनांग मंदिर में होली मिलन का भव्य आयोजन हुआ। यहां 'छाप तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलाइके' जैसे पदों ने माहौल को भक्तिमय कर दिया। दोपहर बाद जहां महिलाओं की टोलियां मोहल्लों में टोली बनाकर निकली। आनंद बल्लभ पंत और सुरेश पंत जैसे कलाकारों की आवाज ने इस परंपरा को जीवंत कर दिया है।

जैसे-जैसे फागुन चढ़ रहा है, पहाड़ की वादियों में होली के रंग और गहरे होते जा रहे हैं। बैठकी होली की यह समृद्ध परंपरा बताती है कि उत्तराखंड अपनी विरासत को सहेजने में आज भी सबसे आगे है। अब इंतजार है 'खड़ी होली' का, जब गांव-गांव में ढोल-नगाड़ों की गूंज और चीर बंधन के साथ उल्लास अपने चरम पर होगा।