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‘संत संसद’ 2026: महामंडलेश्वर यतीन्द्रानंद गिरि महाराज जी ने बताई कॉन्वेंट स्कूलों की सचाई

नेटवर्क 10 न्यूज चैनल ने 29 मार्च को ‘संत संसद’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया। इस कार्यक्रम में देश के कोने-कोने से साधु-संत और महात्मा शामिल हुए। इस आयोजन का मुख्य विषय था— “अब नहीं होगा कोई जात-पात, बात होगी सिर्फ राष्ट्रवाद।” इस विषय पर संतों ने अपने विचार रखे और समाज से जातिवाद से ऊपर उठकर एकजुट होकर आगे बढ़ने का आह्वान किया।

इस भव्य आयोजन में महामंडलेश्वर यतीन्द्रानंद गिरि महाराज जी भी शामिल हुए। अपने संबोधन में उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दुनिया में एक ऐसी शिक्षा पद्धति शुरू हुई, जिसे ‘कॉन्वेंट शिक्षा’ कहा गया, जिसकी जड़ें पाश्चात्य समाज से जुड़ी हैं। उन्होंने आधुनिक सामाजिक परिवर्तनों, जैसे लिव-इन रिलेशनशिप, पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि इससे पारंपरिक भारतीय संस्कार, विवाह और संस्कृति प्रभावित हो रही हैं।

महाराज जी ने अपने विचार रखते हुए ऐतिहासिक संदर्भों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय अंग्रेज भारत की मानसिकता को बदलने के उद्देश्य से मैकाले और डॉक्टर ह्यूम जैसे लोगों को लेकर आए। इसी दौरान मैकाले ने एक ऐसी शिक्षा पद्धति विकसित की, जिसे आज कॉन्वेंट शिक्षा के रूप में जाना जाता है, और यह प्रणाली आज भी भारत में प्रचलित है।

उन्होंने आगे कहा कि उन्हें यह देखकर आश्चर्य होता है कि भारत के बच्चे सेंट जेवियर जैसे संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “सेंट जेवियर कौन था?” उन्होंने दावा किया कि गोवा में आज भी एक लोहे का खंभा मौजूद है, जहां सनातन धर्म को न अपनाने वालों को बांधकर दंडित किया जाता था। उनके अनुसार, ऐसे ऐतिहासिक प्रसंगों को समझना और उनके संदर्भों पर विचार करना समाज के लिए आवश्यक है, खासकर तब जब इन्हीं नामों पर आज विभिन्न शैक्षणिक संस्थान संचालित हो रहे हैं।

अपने संबोधन के अंत में महाराज जी ने जोर देकर कहा कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज की सोच, संस्कार और सांस्कृतिक पहचान को भी आकार देती है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली और उसके प्रभावों पर गंभीरता से विचार करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संतुलित, जागरूक और मूल्य आधारित समाज का निर्माण किया जा सके।